________________
अध्याय : पांचवां ]
धम्यं शुक्ल मिति द्विभेद मुदितं सद्धयानामाखन्तयो, राज्ञाऽपाय विपाकपाच विवयात्संस्थान गारस्पान्यतु । भेदं भूरि विकल्प जाल कलितं जतान्नयान्नैगमा, सर्व सर्वविदो बचो नहि नयायेत यतो वस्तु च ॥१०४२ ॥
सद्ध्यान धर्मध्यान, शुक्लध्यान इस प्रकार दो प्रकार कहा है, उन दोनों में धर्मध्यान आज्ञा, अपाय, विपाक, संस्थान का विषय होने से चार प्रकार का है, जिनेन्द्र भगवान के नैगम नय की अपेक्षा से बहुत से विकल्प जाल से कलित है, क्योंकि सर्वज्ञ भगवान के सब वचन और वस्तु नय से रहित नहीं हैं ।
विज्ञातुं न तु शक्यावृति युताध्यक्षानुमानदिना, त्यानंत विषसंर्वात सकलं वस्त्वस्तदोषाताम् ।
आशायायियोतमन्तं देखि तद्वस्तुल चिन्ताज्ञा fिaast frषुर्नयचयः संज्ञानपुण्योदयः ।। १०४३ ॥
[ ४३१
इन्द्रियातीत अनन्त पर्यायवर्ती सकल वस्तु आवरण युक्त प्रत्यक्ष ज्ञान श्रीर अनुमानादि के द्वारा जानने के लिये शक्य नहीं है, परन्तु बीतरागी श्रहंत की श्राज्ञा से वचनों का विचार है कि भगवान की आज्ञा से कहा गया वस्तु का स्वरूप असत्य नहीं है, इस प्रकार उस वस्तु का चिन्तन सँज्ञान और पुण्य का उदयभूत नय का समूह आज्ञा विषय है ।
g: कर्मात्मदुरोहि तैरुपचितं मिष्याविरत्यादिभि यवज्जन्म जरामृति प्रभृतयो वांडपाय एनः कृताः । जीवेनादिभवे भवेत्कथमलोsपायादपायः कवा, eferrer ममेत्यrय विचयः सत्कारणा दीक्षरम् ||१०४४ ॥
जीव के द्वारा पूर्व भव में मिथ्यात्व अविरति आदि अपनी दुष्चेष्टाओं के द्वारा उपार्जित दुष्कर्म अथवा पापकृत आपत्ति, जन्म, जरा, मृत्यु प्रभृति पाय हैं । इस अपाय से मेरा निराकरण कब होगा ? इस प्रकार सत्कारणों से चिन्तन करना पाय विषय है ।
गत्यादौ परिणामतस्तनुभृतां प्राप्तोदयोदीर, क्लेशाश्लेकरं सुखोत्कर करं कर्माशुमं तच्छुभम् .