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[ गो. प्र. चिन्तामणि
....... अन्यत्य भावना .. बैतन्यं अडकताऽविसंदोहोदिताऽनेकता, नित्यत्वं क्षयिता च मूर्ति वियतिमूर्तत्व मित्यादिभिः।
भेवं देहि शरीर योरगयन् कि नेक्षते वृद्धिम्, - देहं खेदिनि देहिनि स्थित मति कांतेऽत्र भित्रवत् ॥१०५१॥
अवयवी के समूह में प्रकट हुए चैतन्य और अचैतन्य एकमेक हैं। चैतन्य नित्य है और क्षण ध्वसी शरीर है, इसलिये शरीर और आत्मा में अनेकता है । मूर्ति के प्राश्रय है इसलिये मूर्त है, इत्यादि के द्वारा शरीर और आत्मा में भेद को नहीं मानता हुमा खेदकारी आत्मा के निकल जाने पर उत्कर्षता को प्राप्त हुए शरीर को दुभिक्ष के समान यहां पर स्थित क्या नहीं देखता है ? यह अत्यत्व भावना है ।
अशुचि भावना . रेतः शोणि जातिधातु निचितं प्रच्छादितं चमगा, सान्द्रोद्रित्तगलन्मलं बहुबिलरंग जुगुप्सानुगाम् । भौति किं न तनोत्य संस्कृति बहिश्चौधगा न वेत, स्पृष्ट द्रष्टुपि क्षमोऽस्ति किमिदं त्रातुपसण्यादितः ॥१०५२॥
वीय, रक्त, जाति प्रादि धातुनों से व्याप्त चमड़े के द्वारा पाच्छादित नाक, आँख, कर्ण आदि बहुत से बिलों से अत्यन्त प्रवाह से बह रहा है मल जिस में, ऐसा यह शरीर ग्लानि का अनुकरण करने वाली भय को क्या नहीं विस्तारित करता है ? यदि इस शरीर में संस्कार रहित बाहर का चर्म नहीं हो तो क्या इस शरीर को स्पर्श करने के लिये, देखने के लिये, पक्षी प्रादि से रक्षा करने के लिये कौन समर्थ है अर्थात् कोई नहीं है । यह अशुचि भावना है। ..
- प्राश्रय भावना .. देहे स्नेह युते लगत्य विश्त रेपोगरगोऽयं यया, मिथ्यावस कषाय योग कलुषेऽस्त्र सजत्यगिनि । · · तद्वत स्वैक शरीरगा सुनिलिताऽनतारावो वर्गाणा, विश्वात्मावयवेवनंतगणना नो कर्मणा कर्मणाम् ॥१०५३॥
जैसे तेल सहित शरीर में रेणु का समूह निरन्तर लगता है, उसी प्रकार. मिथ्यात्व, अविरति, कषाय और योग से कलुषित संसारी आत्मा में सारे प्रात्मा के
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