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अध्याय : पांचवां ]
[ ४३५ अवयवों पर निरन्तर अपने एक शरीर को प्राप्त होने वाली कर्मों की (नों कर्मों की) सम्यक् प्रकार से मिलो हुई अनन्त अणु जिसमें, ऐसी अनन्त संख्या वाली वर्गणा प्राप्त होती है । ऐसा चिन्तवन करना आस्रव भावना है।
संवर भावना .." दष्टे दुष्ट विषाहिनाऽगिनि यथा. नष्ट प्रवेटे विक्रमांक पुष्याज्जांगलिकेन मंत्र बलिना संस्तमितं तिष्ठतिपyसम्यक्त्य व्रत निकषाय परिणामाऽयोगताभिस्तथा मिथ्यात्वादिस्ततुः स्वहेतु विगमान्नलन सा नागमः ।।
जैसे दुष्ट विष वाले सर्प के द्वारा काटने पर नष्ट चेष्टा वाले प्राणी का विष वैद्य के द्वारा अथवा मन्त्र शक्ति के द्वारा कीलित हो जाता है, उसी प्रकार सम्यक्त्व, नत, निष्कषाय परिणाम और अयोगता के द्वारा मिथ्यात्त्वादि अपने चार कारणों के नाश हो जाने से नूतन पापों का आगमन नहीं रहता है । ऐसा चिन्तवन करना संवर भावना है । .
निर्जरा भावना संशिलष्टात्मस लस्य निगलनतो निःशेष विश्लेषत, श्चान्तर्बाह्य चतुःस्वहेतुवशतः स्वर्णोपले स्वर्णता । यह हिनि फर्मरगोशमलनान्मिः शेष विश्लेषतः, सम्यक्त्व ग्रहणायनेक करणेस्तद्वि शुद्धात्मता ॥१०५५।।
जिस प्रकार कर्षण, छेदन, तापन आदि कारणों के द्वारा अनादिकालीन सुवर्ण की कालिमा नष्ट हो जाती हैं और सुवर्ण शुद्ध बन जाता है, उसी प्रकार सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र आदि गुणों के द्वारा आत्मा की पाप कालिमा दूर हो जाती है और आत्मा शुद्ध बन जाती है ऐसा चितवन करना निर्जरा भावना है।
लोक भावना मध्यांशः परितोऽनंतवियतो लोकस्त्रियालाऽवृतः, _पंच द्रध्य चितः प्रकृत रहितो नित्यः सदाऽवस्थितः । संस्थानेन तु सुप्रतिष्ठक समोऽसंल्य प्रदेश प्रमो, मध्यस्थ अस नालि रज विना स्पृष्टं न ष्टं पदम् ॥१०५६।। अनन्तानन्त प्रदेशी, अखण्ड, सर्वव्यापी, आकाश के मध्य में धनवातवलय,