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[गो. प्र. चिन्तामणि घनोदधिवातवलय और तनुवातवलयों से वेष्टित जीव पुद्गल, धर्म, अधर्म और काल से मरे हुए संस्थान से सुप्रतिष्ठाकार, नित्य, सदा ब स्थित, स्वयंसिद्ध, असंख्यात, प्रदेशी, लोकाकाश है। उसके मध्य में एक राजू चौड़ी, चौदह राजू ऊँची अस नली है । संसारी. प्रारी इस लोक को अपनी चर्म चक्षु के द्वारा पूर्ण रूप से देखने के लिए समर्थ नहीं है । इस प्रकार चिन्तवन करना लोक भावना है। ... .
... मोधि दुर्लभ भावना नकाक्षर्विकलाम करता सं . तु ना, लब्धा बोधिरगण्य पुण्यं वशतः संपूर्ण पर्याप्तिभिः । भव्यः संजिभि राप्तलब्धिविधिभिः कैश्चित्कदाचितवचित्, प्राच्या सा रमता महोय हृदये स्वर्गापवर्गप्रदा ॥१०५७।।
वह बोधि, हीन पुण्य वाले एकेन्द्रिय, दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और असंही पंचेन्द्रिय के द्वारा कभी भी प्राप्त करने योग्य नहीं है । सभ्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और चारित्र की प्राप्ति को बोधि कहते हैं । जिसको क्षयोपशमलब्धि, विशुद्धिलब्धि, देशनालब्धि, प्रायोग्यलब्धि और करण लब्धि प्रात हो गई है, जो संज्ञी है, पञ्चेन्द्रिय है, पर्याप्त है, भव्य है, उसी को ही बोधि की प्राप्ति होती है। वह बोधि निरन्तर मेरे हृदय में वास करे । ऐसा निरन्तर चितवन करना बोधि दुर्लभ भावना है ।
. . . . धर्म भावना वाताऽभीष्ट विशिष्ट वस्तु निमय स्याकांक्षिणेऽपिक्षरणा, खाते नरमारकादि मृवसंभूतेः स्मृते कृतेः । हंताक्रान्त जगत्रयांतक रिपोर्यः स्वाम्तगः संस्तुत, स्वातावारणशरीरिणां नहि परो धर्मात्सुशर्म प्रदात ॥१०५८।।
संसार में अभीष्ट वस्तु को देने वाला धर्म है । स्मृति मात्र से भय देने वाली, नरनारकादि आपत्तियों से बचाने वाला जिन धर्म ही है । तीन जगत् के जीवों को दुःख देने वाले यमराज रूपी शत्रु का नाशक धर्म है। अशरण संसारियों को शरण देने वाला धर्म है, वह धर्म वस्तु का स्वभाव है। वह हृदय में रहता है तब ही जीव की रक्षा होती है। धर्म को छोड़कर इष्ट. वस्तु को देने वाला, आपत्तियों से बचाने वाला, यमराज का नाशक, प्राणियों का रक्षक, दूसरा कोई नहीं है, यह धर्मभावना है।
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