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________________ अध्याय : पांचवां । [ ४३७ वर्म का लक्षण--- श्रद्धानं सदशंकिताविसदनं . तत्वार्थसंचिन्तन, संवेग: प्रशमोदयेन्द्रियदमः प्राज्योद्यमः संयमः । बराग्यं वराप्तिातातिमता निर्मायिसाऽसंगता, धर्मस्येति समस्त बस्तु परमोपेक्षा च लक्ष्मोदितम् ॥१०५६।। तत्त्वार्थ श्रद्धान, नि:शंकत्व तत्वार्थ चिन्तयन, संवेग, प्रशम, दया, इन्द्रियदमन, उत्कृष्ट उद्यम, संयम, वैराग्य, उत्कृष्ट गुप्ति, परिणामों की अति कोमलता, निर्मायित्व, असंगता, समस्त वस्तु के प्रति परम उपेक्षिता यह धर्म का लक्षण कहा है। धम्यं स्यानिखिलार्थ सार्थ निहितं चित्तं समं संस्थितं, सम्यगहष्टय यताविसप्तम गुणांतेषु प्रवृद्ध कमात् । सांबर शिशादि कर नानात्मनां कर्मयां, सल्लेश्यात्रयजं च नाक सुखदं प्राग्न मासिद्धियम् ॥१०६०॥ सकल पदार्थों के समूह में चित्त समान स्थित हो अर्थात् सुख-दुःख आदि में समान भाव और राग-द्वेष का प्रभाव धर्मध्यान है । यह धर्मध्यान अविरत सम्यक्दृष्टि नामक चौथे गुणस्थान से लेकर अप्रमत्त नामक सातवें गुरणस्थान तक क्रम से वृद्धि को प्राप्त होता है। साक्षात् नानात्मक कर्मों की निर्जरा का कारण है। पीत, पद्म, शुक्ल - इन तीन शुभ लेश्या वाले के ही होता है। उत्कृष्ट स्वर्ग के सुत्रों का दाता है और क्रम से मोक्षफल को देता है।। (प्राचारसार, प्रा० बोरनन्दी) शुक्लध्यान का स्वरूप रामाधुपरजाकलाप कलितं सन्देह लोलायित । विक्षिप्तं सकलेन्द्रियार्थ गहने कृत्वा मनो निश्चलम् ।। संसार व्यसन प्रबन्ध बिलयं मुक्त विनोदा स्पदं । . धर्मध्यान मिदं विवस्तु निपुरमा प्रत्यक्ष सौख्यार्थिनः ॥१०६१॥ . अतीन्द्रियः सुख के चाहने वाले निपुण मुनि प्रथम ही रामादिक तींव रोगों के समूह से व्याप्त, अनेक संदेहों से चलायमान अर्थात् जब तक निर्णय न हो तब तक
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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