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[ गो. प्र. चिन्तामणि
स्थिर न रहने वाले और समस्त इन्द्रियों के विषय रूप गहन वन में विक्षिप्त अर्थात् भूले हुए मन को निश्चल करते हैं, संसार के कष्ट प्रापत्ति प्रादि व्यसनों के प्रबन्ध से रहित और मुक्ति के क्रीडा करने का स्थान ऐसे इस ध्यान को धर्म ध्यान कहते हैं ।
भावार्थ :- मन को निश्चल करके धर्म ध्यान होता है; इसमें सांसारिक व्यापार के प्रवर्तन का सर्वथा अभाव है।
श्रात्मार्थं अय मुञ्च मोह गहने मित्र विवेकं कुरु, बेराग्यं भज भावंयस्व नियतं भेदं शरीरात्मनोः ।
धर्मध्यान सुधा समुद्र कुहरे कृत्वावगाहं पर, पश्यानन्त सुख स्वभाव कलितं मुक्त सुखाम्भोरुहम् ||१०६२ ॥
हे श्रात्मन: तूं आत्मा के प्रयोजन का आश्रय कर अर्थात् और प्रयोजनों को छोड़कर केवल आत्मा के प्रयोजन का ही ग्राश्र कर तथा मोह रूपी वन को छोड़, विवेक अर्थात् भेद ज्ञान को मित्र बना, संसार देह के भोगों से वैराग्य का सेवन कर, और परमार्थ से जो शरीर और आत्मा में भेद है, उसका निश्चय से चिन्तवन कर, और धर्म ध्यान रूपी अमृत के समुद्र के कुहर (मध्य) में परम अवगाहन ( स्नान ) करके अनन्त सुख स्वभाव सहित मुक्ति के मुख कमल को देख ।
शुक्ल ध्यान का निरूपण -
वात्यन्तिकी श्रितः । मत्यन्त निर्मलम् ॥। १०६३।।
इस धर्म ध्यान के अनन्तर धर्म ध्यान से प्रतिक्रान्त होकर अर्थात् निकल कर, अत्यन्त शुद्धता को प्राप्त हुआ, धीर कर मुनि प्रत्यन्त निर्मल शुक्ल ध्यान के ध्यावने का प्रारम्भ करता है ।
ग्रंथ धर्म मतिक्रान्तः शुद्धि ध्यातुमारभते वीरः शुल्क
शुक्ल ध्यान का लक्षण ---
निष्क्रियं करणातीतं ध्यान धारण वजिसम्
अन्तर्मुखं च यथितं तच्छ्रुक्तमिति पठयते ॥ १०६४॥
जो निष्क्रिय अर्थात् क्रिया रहित है,
इन्द्रियातीत है, और ध्यान की धारणा इच्छा से रहित है, और जिसमें चित्त
से रहित है अर्थात् "मैं इसका ध्यान करू ऐसी अन्तर्मुख अर्थात अपने स्वरूप के ही सन्मुख है, उसको शक्ल ध्यान कहते हैं ।