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[ गो. प्र. चिन्तामणि ___ प्राचार्य का अभिप्राय यह है कि सिद्ध भगवान वीतराग हैं । वे स्वयं किसी को कुछ नहीं देते हैं, किन्तु उनका ध्यान करने से तथा उनके निर्मल गुणों का चितवन करने से आत्मा की मलिनता दूर होती है और यह मुक्ति के मार्ग में प्रगति को प्राप्त करती है । निरंजन निर्विकार तथा निराकार सिद्धों के ध्यान की रूपातीत नाम के धर्मध्यान में परिगणना की गई है।
___रूपालीत ध्यान से सिद्ध परमात्मा का किस प्रकार योगी चितवन करते हैं, यह ज्ञानार्णव में इस प्रकार कहा है-- . . . . .
व्योमाकारमनाकरं निष्पन्न शांतमच्युतम् । ...... .. चरमांगाकिचन्यूनं स्वप्रदेशैर्धनः स्थितम् ॥१५६७।।
लोकान-शिखरासीनं शिवीभूतमनामम् । . .. पुरुषाकार : मापनमप्यभूतं च चिन्तयेत् ।।१५६८।।
. आकाश के समान अमूर्त, पौद्गलिक आकार रहित, परिपूर्ण, शांत, अवि. नाशी, चरम देह से किंचित् न्यून, धनाकर' आत्म प्रदेशों से युक्त, लोकाय के शिखर पर अवस्थित, कल्याणमय, स्वस्थ, स्पर्शादि गुण रहित पुरुषाकार परमात्मा का ध्यान रूपातीत ध्यान में करें।
ध्यान के अभ्यासी के हितार्थ प्राचार्य शुभचन्द्र ने ज्ञानार्णव में यह महत्वपूर्ण कथन किया है--
अनुप्रेक्षाश्च धय॑स्य स्युः सदैव निबंधनम् । चित्तभूमौ स्थिरीकृत्य स्वस्वरूपं निरुपय ॥१५६६॥
हे साधु ! अनुप्रेक्षाओं का चितवन सदा धर्मध्यान का कारण है । अतएव अपनी मनोभूमि में द्वादश भावनाओं को स्थिर करो तथा अात्मस्वरूप का दर्शन करो। .
. ब्रह्मदेव सूरि का यह अनुभव भी प्रात्म ध्यान के प्रेमियों के ध्यान देने योग्य है--'यद्यपि प्राथमिकानां सविकल्पावस्थायां चित्त स्थिति-करणार्थ विषय-कषाय रूपदुर्ध्यान वंचनार्थं च जिनप्रतिमाक्षरादिकं ध्येयं भवतीति, तथापि निश्चयध्यानकाले स्वशुद्धात्मैव ध्येयः इति भावार्थः' (परमात्म प्रकाश दीका पृ. ३०२, पद्य २८६) पद्यपि सविकल्प अवस्था में प्रारम्भिक श्रेणी वालों के चित्त को स्थिर करने के लिये जिनप्रतिमा तथा जिनवाचक अक्षरादिक भी ध्यान करने के योग्य हैं, तथापि निश्चय ध्यान के समय शद्ध प्रात्मा ही ध्येय है।
संस्कार