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________________ अध्याय : आठवां ] [ ७३५ का भी परित्याग हो जाता है, कारण उस शुद्धि की ओर प्रगतिशील पुरुष को मोक्ष की भी अभिलाषा का परित्याग आवश्यक कहा गया है । यह कथन सापेक्ष है। प्रार. म्भिक अवस्था में भोगकांक्षा का त्याग करके मुक्ति की भावना तथा अभिलाषा के लिये प्रेरणा की जाती है, किन्तु पपचात् समर्थ आत्मा उस मिरिण की भी अभिलाषा का त्याग करता है । अकलंक देव ने उक्त रचना में लिखा है मोक्षेऽपि यस्य नाकांक्षा स मोक्षमधिगच्छति । इत्युक्तत्वात् विनानेशी कांक्षा नसतानि मोजयेत् ॥१५६४॥ सिद्धों के विशेष गुण इन सिद्धों के चार अनुजीवी गुण कहे गये हैं। जो घातिया कमों के विनाश से अरहन्त अवस्था में ही उत्पन्न होते हैं। ये गुरण भावात्मक कहे गये हैं । ज्ञानावरा के क्षय से केवलज्ञान, दर्शनावरसा के विनाश से केवल दर्शन, मोहनीय के उच्छेद से अविचलित सम्यक्त्व तथा अन्तराय के नाश द्वारा अनन्तवीर्य रूप मुरण-चतुष्टय प्राप्त होते हैं । अधातिया कमों के अभाव में चार प्रतिजीवी गुण उत्पन्न होते हैं । वेदनीय के विनाश से अव्याबाधत्व गुरण प्रगट होता है । गोत्र के नाश होने पर अगुरुलघु गुण प्राप्त होता है । नाम कर्म के अभाव में अवंगाहनत्व तथा प्रायु कर्म के (जिसे जगत् मृत्यु, यमराज आदि के नाम से पुकारता है। विनाश होने पर सूक्ष्मत्त्व यह चार प्रतिजीवी गुण प्रगट होते हैं। इन अनुजीवी तथा प्रतिजीवी गुणों से अलंकृतं यह सिद्ध पर्याय है ! इससे स्वभाव-द्रव्य-व्यंजन पर्याय भी कहते हैं । पालाप पद्धति में लिखा है 'स्वभाव-द्रव्य-व्यंजना-पर्यायाश्चरमशरीरात--किचित्-सिद्धपर्यायाः' (पृ.१६६) सिद्ध परमेष्ठी की महत्ता को योगी लोग भली प्रकार जानते हैं । इससे महापुराणकार उनको ‘योगिनां गम्यः, योगियों के ज्ञान गोचर कहते हैं । जिनसेन स्वामी का यह कथन प्रत्येक मुमुक्षु के लिये ध्यान देने योग्य है वीतरागोऽप्यसौ ध्येयौ भव्यामां भवविच्छिदे । विच्छिन्नबंधनस्थास्य तादृग्नैसगिको पुरसः ॥१५६६॥ मच्यात्माओं को संसार का विच्छेद करने के लिये वीतराग होते हुये भी इन सिद्धों का ध्यान करना चाहिये । कर्म बन्धन का विच्छेद वाले सिद्ध भगवान का यह नैसर्गिक गुण कहा गया है।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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