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________________ N ७३४ ] गो. प्र. चिन्तामणि प्रसंग के द्वारा उस एकांतवाद का भी निराकरण हो जाता है, जो लोग निमित्त कारण की पूर्णतया उपेक्षा करते हैं। स्वामी समन्तभद्र ने बाह्य तथा अभ्यंतर कारणों की पूर्णता को कार्य का साधक माना है । मोक्ष के लिए अन्तरंग अपरिग्रहत्व प्रावश्यक है, किन्तु इसके लिये बाह्य परिग्रह का परित्याग भी जरूरी है । बाहरी वस्त्रादि धारण करते हुए जीव प्रमत्तसंयत की श्रेणी में भी नहीं पहुँच सकता है । मोक्ष की बात तो निराली ही है ! निमित्त कारण तथा उपादान कारण अपनी-अपनी सीमा के भीतर उचित हैं। कोई निमित्त को हो उपादान का स्थान देता है, तो विषम परिस्थिति उत्पन्न हुए बिना न रहेगी। लोकान में सिद्ध परमात्मा की अवस्थिति यह सूचित करती है कि निमित्त कारण का भी उचित स्थान है । एकांत पक्ष को पकड़ना दुराग्रह है ! अागमभक्त को सत्याग्रही बनना चाहिये । असत्य का प्राग्रह करने से तत्वाज्ञान का प्रदीप बुझ जाता है। प्रश्न--मुक्तात्मा अमुक्त भी हैं। यहां शंका-सिद्ध भगवान मुक्ति लक्ष्मी के स्वामी हो गये हैं, अब इनका मुक्ति श्री से कभी भी वियोग नहीं होगा, रसाए यदि इयर को सुपर ही नाटो हो, पाप भी स्याद्वादी के स्थान में एकान्तवादिता के दोषी बन जाते हैं ? उत्तर-~-भगवान को एकान्त रूप से मुक्त नहीं माना गया है। वे मुक्त भी हैं, अमुक्त भी हैं । मुक्तात्माओं को अमुक्त कहना आश्चर्य प्रद लगेगा, किन्तु तार्किक अकलंक देव का कथन पूर्णतया युक्तियुक्त तथा अविरोधी भी लगेगा। वे 'स्वरूप संबोधन' नाम की पंचविंशति पद्यात्मक रचना के मंगल पद्य में उक्त विषय में महत्वपूर्ण प्रकाश प्रदान करते हैं-- मुक्ताऽमुक्त करूपो यः कर्मभिः संविदादिना। . अक्षयं परमात्मानं ज्ञानमूर्ति नमामि तम् ।।१५६४३ मैं ज्ञानभूति अविनाशी परमात्मा को नमस्कार करता है, जो कर्मों से मुक्त हैं और ज्ञानादि गुणों से अमुक्त हैं अर्थात् युक्त हैं। इस प्रकार ज्ञानमूर्ति के परमामा कर्मों की अपेक्षा मुक्त हैं । झानादि गुणों की दृष्टि से अमुक्त भी हैं । स्याद्वाद ज्योति के प्रकाश में शंका रूपी तिमिर तत्काल दूर हो जाता है । इस मुक्तामुक्त रूप अवस्था की प्राप्ति के लिये. जीव को मोक्ष की अभिलाषा भी त्याज्य कही गई है। मुक्ति की अभिलाषा करने वाला मुमुक्षु माना जाता है । शुद्धोपयोग की अवस्था में यह जीव मुमुक्षु रहता है। शुद्धोपयोग की भूमि में प्रवेश करते समय 'मुमुक्षु' संज्ञा
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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