________________
अध्याय आठवां ]
जनेभ्यः सुखिनो भूपाः भूपेभ्यश्चक्रवर्तिनः । चक्रिभ्यो व्यंतरास्तेभ्यः सुखिनो ज्योतिषोऽमराः ।। १५६१।। ज्योतियों भवनावासास्तेभ्यः करूपभुवः क्रमात् । ततो कावासास्ततोऽनुसर वासिनः ॥१५२॥
अनन्तानन्त गुरणतस्तेभ्यः सिद्धपदस्थिताः ।
[ ७३३
सुखं नापरमुत्कृष्टं विद्यते सिद्धसौख्यतः ।। १५६३॥
मनुष्यों की अपेक्षा राजा सुखी है, राजाओं की अपेक्षा चक्रवर्ती सुखी, चक्रवर्ती की अपेक्षा व्यंतर देव तथा व्यन्तरों की अपेक्षा ज्योतिषी देव सुखी है । ज्योतिषी देवों की अपेक्षा भवनवासी तथा भवनवासियों की अपेक्षा कल्पवासी सुखी हैं । कल्पवासियों की अपेक्षा ग्रैवेयकवासी तथा ग्रैवेयकवासियों की अपेक्षा विजय वैजयन्त, जयन्त, अपराजित तथा सर्वार्थसिद्धि यह पंच अनुत्तरवासी देव सुखी हैं। उनसे भी अनन्तानन्त गुणे सुख युक्त सिद्धपद को प्राप्त सिद्ध भगवान हैं । सिद्धों के सुख की अपेक्षा और उत्कृष्ट प्रानन्द नहीं है ।
सिद्धों के ऐसे आनन्द के समय अन्य संसारी जीव अपने को सुली समझते हैं । उनका सुख ऐसा ही अवास्तविक है, जैसे नाटक में नरेश का अभिनय करने वाले व्यक्ति का काल्पनिक राज्य का स्वामित्व भी यथार्थ है ।
प्रश्न --- सिद्ध भगवान लोक के अन्त तक जाकर क्यों ठहर जाते ? म का उगमन स्वभाव है । अनन्त शक्ति भी सिद्ध भगवान के पाई जाती है । ऐसी स्थिति में वे लोक के प्रग्रभाग तक जाकर क्यों ठहर जाते हैं ? उनके मन को रोकने को सामर्थ्य किसमें हो सकती है ?
उत्तर— वस्तु का स्वाभाव विचित्रतापूर्ण है । धर्म द्रव्य नाम के गमन में उदासीनता रूप से सहायता प्रदान करने वाले द्रव्य का लोकाग्र तक सद्भाव है । उस निमित्त कारण का जहां तक सद्भाब था, वहां तक मुक्त जीव गये और जहां उस द्रव्य
भाव हो गया, वहां अनन्त शक्ति वाले तथा ऊर्ध्वगमन सामर्थ्य सम्पन्न सिद्ध परमात्मा को भी रुक जाना पड़ता है। जैनतत्व व्यवस्था की यही तो अलौकिकता है कि तत्व के स्वरूप को बदलने की किसी में सामर्थ्य नहीं है । परमात्मा अपने निजतत्व का स्वामी हैं । अन्य द्रव्य के व्यवस्थित कार्यक्रम में उसका हस्तक्षेप नहीं रहता है । इस