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{गो. प्र. चिन्तामणि पीडिट अपर के जीतों का पनभन मोह से रहित स्वस्थ अर्थात् आत्मस्वभाव में अवस्थित सिद्ध भगवान के विषय में लगाना अनुचित है। कहा भी है..
नार्थः क्षुस्तृदिनाशात् विविधरसयुतरन्नपानरशुच्या। नास्पृष्टे गन्धमाल्यार्महिमृदुशयनग्लानिनिद्राधभावात् ॥
आतंकातेरभावे तबुपशमनापजानर्थतावद् । दीपानर्थक्यवहां व्यपगततिमरे दृश्यमाने समस्ते ॥१५६०।।
अवर्णनीय, इन्द्रिय जनित सुख का अनुभव लेने वाले सर्वार्थ सिध्दि के अहमिन्द्र सदा यही अभिलाषा करते हैं कि किस प्रकार उनको शिब्दों का स्वाधीन तथा इंद्रियातीत अविनाशी सुख प्राप्त हो। सर्वार्थ सिध्दि के अहमिन्द्रों में पूर्णतया समानता रहने से पुण्यात्मानों का परिपूर्ण साम्यवाद' पाया जाता हैं, ऐसा ही साम्यवाद उनसे द्वादश योजन ऊंचाई पर विराजमान सिध्दों के मध्य पाया जाता है । यह अध्यात्मिक विभूतियों के मध्य स्थित साम्यवाद है । अहमिन्द्रों का साम्यवाद तंतीस सागर की आयु समाप्त होने पर तत्क्षण समाप्त हो जाता है अर्थात् वहाँ से चय होने पर अवस्थांतर-मनुष्य पर्याय में आना पड़ता है। सिध्दों के मध्य का समाजवाद अविनाशी है । सब आत्माएँ परिपूर्ण तथा स्वतंत्र हैं। एक दूसरे के परिणमन में न साधक हैं, न बाधक हैं।
संसार में शरीरान्त होने पर शोक करने की प्रणाली है, किन्तु यहां भगवान का देहान्त होते हुए भी आन्दोत्सव मनाया जा रहा है, कारण आज भगवान को चिरजीवन प्राप्त हुआ है। मृत्यु तो कर्मों की हुई है । आत्मा आज अपने निज भवन में जाकर अनन्त सिद्ध बन्धुओं के पावन परिवार में सम्मिलित हुआ है । आज प्रात्मा ने स्व राज्य रूप सार्थक स्वराज्य का स्वामित्व प्राप्त किया है, भगवान के अनन्त मानन्द लाभ की बेला में कौन विवेकी व्यथित होगा? इसी से देवों ने उस प्राध्यात्मिक महोत्सव की प्रतिष्ठा के अनुरूप प्रानन्द नाम का नाटक किया था । इस प्रानन्द नाटक के भीतर एक एक रहस्य का तत्व प्रतीत होता है । सच्चा आनन्द तो कर्मराशि के नष्ट होने से सिद्धों के उपयोग में प्राता है । संसारी जीव विषय भोग कर सुख का नकली नाटक सदा दिखाया करते हैं । सिद्धों के प्रानन्द' की कल्पना भी नहीं की सकती है । आचार्य रविषेश ने पद्मपुराण में बड़ी सुन्दर बात कही है--