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अध्याय : पाठवां ]
[ ७३१ है । सिद्धावस्था का सौख्य अनंत है। वहाँ दुःख का लेश भी नहीं है । विनकारी कर्मों का पूर्ण क्षय हो चुका है। नियमसार में कहा है
रणदि कम्भ गोकम्म पनि चिता पेय अस्ट्रागि। रवि धम्मा--सुक्कझाणे सत्थेव होइ णिव्याणं ॥१५॥
सिद्ध भगवान के कर्म नोकर्म नहीं है, चिन्ता नहीं है। प्रात रौद्र ध्यान नहीं है । धर्मध्यान तथा शुक्ल ध्यान नहीं है। ऐसी अवस्था में ही निर्वाण है । पुनः कुन्द-कुन्द स्वामी कहते हैं
णियाणमेव सिद्धा सिद्धा रिणवारसमिदि समुट्ठिा। कम्मधिमुक्को प्रप्पा गच्छइ लोयागपज्जतं ॥१५८६॥
निर्वाण ही सिध्द है और सिध्द ही निर्धारण है, अर्थात् दोनों में अभिन्नता है। कर्मों से रहित आत्मा लोक के अग्न पर्यंत जाती है । प्रश्न :-भोजन पान आदि के द्वारा सुख प्राप्त होता है, यह संसारी प्राणी
का अनुभव है। अतएव सिद्धालय में सुख जनक सामग्री के प्रभाव
में सिद्ध परमात्मा के किस प्रकार सुख माना जायगा? उत्तर :--सिद्धभक्ति में लिखा है-भगवान ने क्षुधा तथा प्यास के कारणभूत असातावेदनीय कर्मो का नाश कर दिया है उस भूख की वेदना का क्षय हो जाने से असंख्य प्रकार के भोजन व्यंजन प्रादि पदार्थ व्यर्थ हो जाते हैं । क्षुधा की वेदना को दूर करने को संसारी जीव आहारादि ग्रहण करते हैं। उन सिद्धों के वेदना ही नहीं है, अतः औषधि रूप आहार की कोई भी उपयोगिता नहीं रहती है। अपवित्रता से सम्बन्ध न होने के कारण सुमंधित माला प्रादि की भी कोई आवश्यकता नहीं है। ग्लानि, निद्रा आदि के कारण दर्शनावरण तथा मोहनीयादि कर्मों का क्षय हो गया है, अतएव मदु शयन पासनादि की आवश्यकता नहीं है। भीषण रोम जनित पीड़ा का अभाव होने के कारण उस रोग के उपशमन हेतु ली जाने वाली प्रौषधि अनुपयोगी है । अथवा दृश्यमान जगत् को सूर्य के प्रकाश के रहने पर दीपक के प्रकाश का प्रयो
जन नहीं रहता है, इसी प्रकार सिद्ध भगवान के समस्त इच्छाओं का अभाव है, । इसलिये बाह्य इच्छापूर्ति करने वाली सामग्री की आवश्यकता नहीं है। मोह ज्वर से
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