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________________ ७३० ] [ गो. प्र. चिन्तामणि कहता है, 'सुखितोऽस्मि' में सुखी हैं। पुण्य कर्म साता वेदनीय के विपाक-उदय से इन्द्रिय तथा पदार्थ से उत्पन्न सुख प्राप्त होता है । श्रेष्ठ सुख की प्राप्ति, कर्मक्लेश का अभाव होने से, मोक्ष में होती है । मोक्ष के सुख के समान आज सानंद नहीं है. इससे उस मोक्ष के सुख को निरुपम कहा है । त्रिलोकसार में लिखा है चक्कि-कुरु-फरिण-सुरेन्दे-अहमिन्दे जं सुह तिकालभवं । तत्तो असंतपुरिणदं सिद्धाणं खणसुहं होदि ।।१५८५।। चक्रवर्ती, कुरु, नागेन्द्र, सुरेन्द्र, अहमिन्द्रों में जो क्रमशः अनंतगुणा सुख पाया जाता है, उनके सुखों को अनंत गुणित करने से जो सुख होता हैं; उतना सुख सिद्ध भगवान को क्षणमात्र में प्राप्त होता है। सुख और दुःख की सूक्ष्मता पूर्वक मीमांसा की जाय, तो ज्ञात होगा कि सच्चासुख तथा शान्ति भोग में नहीं, त्याग में है। भोग से तृष्णा की वृद्धि होती जाती है । उससे अनाकुलता रूप सुख का नाश होता जाता है । इन्द्रिय जनित सुख का स्वरूप समझाते हुए प्राचार्य कहते हैं-तलवार को धार पर मधु लगा दिया जाय । उसको चाटते समय कुछ पानंद अवश्य प्राप्त होता है, किन्तु जीभ के कट जाने से अपार वेदना होती है। विषय जनीत सुखों को दुःख कहने के बदले में सुखाभास नाम दिया जाता है । परमार्थ दृष्टि से यह सुखाभास दुःख ही है । पंचाध्यायी में वैषयिक सुख के विषय में कहा है-- ऐहिकं यत्सुखं नाम सर्व वैषयिकं स्मृतम् । नहि तत्सुखं सुखाभासं किन्तु दुःखमसंशयम् ।।१५८६॥ । वह इन्द्रियजन्य सुख सुखाभास है, यथार्थ में बह दुःख ही है ! शक-चक्रधरादीनां केवलं पुण्यशालिनाम् । तृष्णाबीजरतिम् तेषां सुखावाप्तिस्कुतस्तनी ॥१५८७॥ प्रश्न :-महापुण्यशाली इन्द्र, चक्रवर्ती आदि जीवों के तृष्णा के बीजरूप रति अर्थात् प्रानन्द पाया जाता है। उनको सुख की प्राप्ति कैसे उत्तर :- इन्द्रिय जनित सुख कर्मोदय के प्राधीन है। सिद्धों का सुख स्वाधीन है । इन्द्रिय जनित सुख अन्त सहित है, पाप का बीज है तथा दुःखों से मिश्रित
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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