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अध्याय : आठवां ]
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प्राप्त है, उसको जिनेन्द्र की अष्टगुणरूप सम्पति की प्राप्ति होती है । ऐसी अवस्था की सदा अभिलाषा की जाती है। छह माह माठ समय में ६०८, छह सौ ग्राठ महान को प्रात्मगुणरूप विधियां प्राप्त होती है। जीवन में मोक्ष प्राप्ति से बढ़कर श्रेष्ठ क्षण नहीं हो सकता है । श्रतएव विचारवान् व्यक्ति की दृष्टि से निर्धारण कल्याणक का सर्वोपरि महत्व है। वह अवस्था आम गुणों का चितवन करते हुये जीवन को उज्ज्वल बनाने की प्रेरणा प्रदान करती है ।
मोक्ष प्राप्ति की महत्ता को सभी स्वीकार करते हैं, किन्तु अन्य जीवों के समाधिमरण को वे शोक का हेतु सोचते हैं । इस संबंध में हरिवंश पुराण से महत्व पूर्ण प्रकाश प्राप्त होता हैं । श्राचार्य कहते हैं
मिथ्यादृष्टेः सतो, जन्तोः मरणं शोचनाय हि ।
न तु वर्धनशुद्धस्य षमाधिमरलं शुचे ॥१५८३॥
fretreat जीव का मरण सत्पुरुषों के लिये शोक का कारण है, क्योंकि उस जीव ने अपनी आत्मा का कल्यास नहीं किया है, तथा विषयों में आसक्त होकर दुर्लभ नर जन्म बिता दिया । सम्यग्दर्शन से विशुद्ध आत्मा का समाधिमरण शोक का कारण नहीं है ।
प्रश्न :--- - सिद्धों के किस प्रकार का सुख माना जायेगा ?
अष्ट कर्मों के नाश करने वाले शरीर रहित मुक्तात्मा के कैसे सुख पाया जायेगा ?
शंकाकार का अभिप्राय यह है कि शरीर के होने पर सुखोपभोग के साधन इन्द्रियों द्वारा विदयों से श्रानंद की उपलब्धि होती थी । मुावस्था में शरीर का नाश हो जाने से सुख का सद्भाव कैसे माना जाये ?
उत्तर: - सुख का प्रयोग लोक में विषय, वेदना का अभाव, विपाक, मोक्ष इन चार ग्रंथों में आता है ।
लोके चतुविहार्थेषु सुख शब्दः प्रयुज्यते ।
faad draiser विपाके सोक्ष एव च ।। १५८४ | ३
'सुखं वायुः सुखं वन्हि:' यह पवन आनंददायी है ।
है। यहां विषय में सुख शब्द का प्रयोग हुआ है । दुख का अभाव होने पर पुरुष
यह प्रति अच्छी लगती