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[ गो. प्र. चिन्तामणि सर्वथा क्षय हो जाने से जन्म-मरण की शृखला समाप्त हो जाती है । इस पंचम काल में संहनन की हीनता के कारण मोक्ष के योग्य शुक्लध्यान नहीं बन सकता है, अतः मोक्ष के होने का वर्तमान काल में भरत क्षेत्र में प्रभाव है.।।
सतगी संप्रदायों में निर्माण का प्रांतरिक मर्म का प्रवबोधन होने से वे लोक प्रसिद्ध व्यक्ति की मृत्यु को भी परिनिर्वाण या महानिर्वाणा कह देते हैं । सम्पूर्ण परिग्रह को त्याग कर दिगम्बर मुद्राधारी श्रमरण बनने वाले व्यक्ति को रत्नत्रय की पूर्णता होने पर मोक्ष प्राप्त होता है । जो कुगुरू, रागी, द्वषी देवों तथा हिंसामय धर्म से अपने को उन्मुक्त नहीं कर पाये हैं, उनकी मृत्यु को निरिण मानना उचित नहीं है । तत्वज्ञानी ऐसी भ्रान्त धारणाओं के जाल से अपने को बचाता है ।
तत्वार्थ सार में एक सुन्दर शंका उत्पन्न कर उसका समाधान किया गया है।
स्यादेतदशरीरस्य . जसोनष्टाष्टकर्मणः । . . कथं भवति मुस्तस्य सुखमित्युत्तरंथ णु ॥१५८२॥
प्रत्येक निर्वाण दीक्षा लेने वाले श्रमण भगवान का स्मरण करते हुए यह कामना करते हैं, 'इच्छामि भंते! कम्मरखो। भगवान! मैं कर्मों के नाश की आकांक्षा करता हूँ। 'भते! समाहिमरणं जिणगुण संपत्ति होहु मज्झं प्रभो!' मुझे समाधिमरण प्राप्त हो तथा जिनेन्द्र गुण संपत्ति को प्राप्ति हो।
सत्रह प्रकार के भरणों में समाधि अर्थात् मनोगुप्ति, बचोगुप्त तथा कायगप्ति की पूर्णतापूर्वक शरीर का त्याग अयोगी जिन के पाया जाता है । उस मरण का नाम पंडित-पंडित मरण कहा है। मिथ्यात्वी जीवों का भरण 'बाल-बाल' मरण कहा है । 'पंडा यस्यास्ति असौ पंडितः' । जिसके पंडा का सद्भाव है, वह पंडित है । मूलाराधना में लिखा है----'पंडा हि रलत्रय--परिणता बुद्धिः' (पृष्ठ १०५)
रत्नत्रय धर्म के धारण करने में उपयुक्त बुद्धि पण्डा है। उस बुद्धि से अलंकृत व्यक्ति पंडित है, सच्चा पांडिल्य तो तब ही शोभायमान होता है, जब जीव हीनाचार. का त्याग कर विशुद्ध प्रवृत्ति द्वारा अपनी प्रात्मा को अलंकृत करता है। प्रागम में व्यवहार पंडित, ज्ञान पंडित तथा चारित्र से सम्पन्न होने के कारण पंडित-पंडित है। उनका शरीरान्त पंडित-पंडित मरण है । इसके पश्चात् उस आत्मा का भरण पुनः नहीं होता है । जिस शुद्धोपयोगी, ज्ञान चेतना का अमृतपान करने वाले को ऐसी समाधि
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