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अध्याय : आठवां ]
| ७२७ प्रतिष्ठा करके उसका पूजन करना चाहिए, इस विषय का वर्णन आया है :--
गह:--ऐदथुगीनाचायादिषु पुषाचार्यगुणस्य. सत्तां वीक्ष्य तत्पादुकाद्वयं अचार्यादिप्रतिष्ठावत् प्रतिष्ठापयेत् । प्रसिद्ध संन्यास मरण प्राप्त गुर्वादि निषेधिकां जिनगृहे निष्यि जिनप्रतिष्ठाकाले प्रतिष्ठाप्य क्षपकांगोज्झनभूमौ निवेशयेत् । अथवा बहिरेव निर्माप्य जिन प्रतिष्ठा समये नयनोन्मीलनं तद्रव्येण प्रापथ्य तत्र गत्वा शेश्वविधि स्वयमिन्द्रः कृत्वा संघ क्रियां कुर्यात् । अथवा क्षरांगोजनावनो आचार्यादि. प्रतिष्ठोक्तविधि सर्व समासतः कृत्वा वद्धमान स्वामिनिर्वाण काले निषेधिकां प्रतिष्ठापयेत् ।
उपर्युक्त प्राधार से वर्तमान में जहां-जहां निषीधिका हैं, वहां-वहां के श्रावक लोग उनकी निस्य नैमित्तिक, जो पूजा करते हैं, वह यथायोग्य होते हुए भी शास्त्रोक्त है।
प्रश्न :- मत्यु, मोक्ष और समाधि में क्या अन्तर है ?
उत्तर :---पौद्गलिक कर्मों का प्रात्मा से सम्बंध छूटने को द्रव्यमोक्ष कहते हैं । जिन परम विशुद्ध भावों द्वारा संकर तथा निर्जरा द्वारा कर्मों का क्षय होता है, उसे भाव मोक्ष कहते हैं। इस मोक्ष अवस्था में कर्म और जीव पृथक हो जाते हैं। बंध की अवस्था में कर्म ने जीवा को बांधा था और जीव ने कमरे को पकड़ लिया था । उस अवस्था में जीव और पुद्गल में विकार उत्पन्न होने से वैभाविक परिगमन हुआ करता था। मोक्ष होने पर जैसे जीव स्वतन्त्र हो जाता है, उसी प्रकार बंधन बद्ध कर्म परिणत पुद्गल भी स्वतन्त्र हो जाता है। जीव की स्वतंत्रता का फिर विनाश नहीं होता, किन्तु पुद्गल पुनः अशुद्ध पर्याय को प्राप्त कर अन्य संसारी जीवों में विकार उत्पन्न करता है । दोनों की स्वतंत्रता में इतना अंतर है।
भगवान के निर्धारण का दिन यथार्थ में प्राध्यात्मिक स्वाधीनता दिवस है। उस दिन मृत्यु की मृत्यु हुई है और पुरुषार्थी प्रात्मा ने श्रेष्ठ पुरुषार्थ को प्राप्त किया है। निर्वाण और मृत्यु में अन्तर है । भुज्यमान आयु कर्म के नष्ट होने के पूर्व ही अागामी भव की आयु का बंध होता रहता है। वर्तमान आयु का क्षय होने पर वर्तमान शरीर का परित्याग होता है । पश्चात् जीव पूर्व बद्ध आयु कर्म के अनुसार अन्य देह को धारण करता है। इस प्रकार मृत्यु का सम्बन्ध प्रगामी जीवन से बना रहता है । मोश्च में ऐसा नहीं होता है। परिनिर्वाण की अवस्था में आयुकर्म का