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[ मो. प्र. चिन्तामणि कर्म भूमि से अतिरिक्त मनुष्य लोक में, पाताल लोक में और स्वर्गों में भी विकलत्रय नहीं होते हैं। क्षेत्रों का विभाग करने वाले पर्वतों का नाम---
तविभाजिनः पूर्वापरायता हिमवन्महाहिमवन् । निषच नील रुक्मि शिखरियों वर्षश्वर पर्वताः ॥११७०३
भरत प्रादि सात क्षेत्रों का विभाग करने वाले, पूर्व से पश्चिम तक लम्बे हिमवान्, महाहिमवान्, निषध नील, रुक्मि और शिखरी ये अनादि निधन नाम वाले छह पर्वत हैं। ............ ..
भरत और ऐरावत क्षेत्र की सीमा पर सौ योजन ऊंचा और पच्चीस योजन भूमिगत हिमवान् पर्वत है । हैमवत और हरि क्षेत्र की सीमा पर दो सौ योजन ऊँचा और पचास योजन भूमिगत महाहिमवान् पर्णत है। हरि और विदेह क्षेत्र की सीमा पर चार सौ योजन ऊँचा और सौ योजन भूमिगत निषध पर्वत है। विदेह और रम्यक क्षेत्र की सीता दर चार सौ योजन ऊँचा और एक सौ योजन भूमिगत नील पर्वत है । रम्यक और हैरणवत क्षेत्र की सीमा पर दो सौ योजन ऊँचा और पचास योजन भूमिगत रुक्मि पर्वत है। हैरण्यवत और ऐरावत क्षेत्र की सीमा पर सौ योजन ऊँचा और पच्चीस योजन भूमिगत शिखरी पर्वत है। पर्वतों के रंग का वर्णन----
हेमार्जुन तपनीय वैडूर्य रजत हेम मयाः ॥११७१॥
- उन पर्वतों का रंग, सोना, चांदी, सोना, बैंड्र्यमणि, चांदी और सोने के समान है। - हिमवान् पर्वत का वर्ण सोने के समान अथवा चीन के वस्त्र के समान पीला है । महा हिमवान् पर्वत का रंग चांदी के समान सफेद है । निषध पर्वत का रंग तये हुये सोने के समान लाल है। नीला पर्वत का वर्ण वैडूर्यमणि के समान नौला है। रुक्मि पर्वत का वर्ण चाँदी के समान सफेद है । शिखरी पर्वत का रंग सोने के समान पीला
पर्वतों का आकार- मणिविचित्र पाव उपरि मूले च तुल्य विस्तारः ॥११७॥ .