SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 580
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ अध्याय : सातवां ] [ ४६१ लिखते हैं । आठों क्षेत्र दो खुण्डों (५ म्लेच्छ और १ आर्य) से शोभायमान हैं। सीता नदी में मागधवरतनुप्रभास नामक व्यन्तरदेव रहते हैं । __सीतोदा नदी अपरचिदेह के बीच से निकल कर पश्चिम समुद्र में मिली हैं। उसके द्वारा दो विदेह हो गये हैं - दक्षिण विदेह और उत्तर विदेह । उत्तर विदेह का वर्णन पूर्व विदेह के समान ही है। . . सीतोदा नदी के दक्षिण तट पर जो क्षेत्र हैं उनके नाम-१. पना, २. सुपना, ३. महापा, ४. पद्मकावती, * शङ्खा, ६. नलिना, ७. कुमुदा, ८. सरिता । - इन क्षेत्रों के मध्य की पाठ मूल नगरियों के नाम-१. अश्वपुरी, २. सिंहपुरी, ३. महापुरी, ४. विजयापुरी, ५. अरजा, ६. विरजा, ७. अशोका, ८. बीतशोका । सीतोदा नदी के उत्तर तट पर जो पाठ क्षेत्र हैं उनके नाम-१. वप्रा, २. सुनता, ३. महावा, ४. वप्रकावती, ५. गन्धा, ६. सुगन्धा, ७. गन्धिला, गन्धमादिनी। इन क्षेत्रों सम्बन्धी प्राठ मूल नगरियों के नाम---१. विजया, २. वैजयन्ती, ३. जयन्ती, ४. अपराजिता, ५. चक्रा, ६. खंगा, ७. अयोध्या, ८. अवध्या । क्षेत्र और पश्चिम समुद्र की वेदी के मध्य में भूतारण्य बन है। नील और रुविम पर्वत तथा पूर्व और पश्चिम समुद्र के बीच में रम्यक क्षेत्र है । रम्यक क्षेत्र में मध्यम भोग भूमि की रचना है। इसका वर्णन हरि क्षेत्र के समान है । रम्यक क्षेत्र के मध्य में गन्धवान पर्वत है । रुक्मि और शिखर पर्वत तथा पूर्व और पश्चिम समुद्र के बीच में हैरण्यवत क्षेत्र है । इस क्षेत्र में जघन्य भोग भूमि की रचना है। इसका वर्णन हैमवत क्षेत्र के समान है । हैरण्यवत क्षेत्र के मध्य में माल्यवान् पर्वत है। शिखरि पर्णत और पूर्ण, अपर, उत्तर समुद्र के बीच में ऐरावत क्षेत्र है। ऐरावत क्षेत्र का वर्णन भरत क्षेत्र के समान है। पांचों मेरु सम्बन्धी ५ भरत, ५ ऐरावत नौर ५ विदेह इस प्रकार १५ कर्म भूमियां हैं। __५ हैमवत, ५ हरि, ५ रम्यक, ५ हैरण्यवत, ५ देवकुरु और ५ उत्तर गुरु इस प्रकार ३० भोग भूमियां हैं । विकलत्रय जीव कर्म भूमि में ही होते हैं । लेकिन समवशरण नहीं होते हैं।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy