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________________ ४६० ] [ गो. प्र. चिन्तामणि वेदी और वक्षार पर्वत के बीच में एक क्षेत्र है। क्षार पर्वत और दो विभंग नदियों के बीच में दूसरा क्षेत्र है । विभंग नदी और वक्षार पर्वत के मध्य में तीसरा क्षेत्र है । वक्षार पर्वत और दो विभंग नदियों के बीच में चौथा क्षेत्र है। विभंग नदी और वक्षार पति के बीच में पांचवा क्षेत्र हैं । वक्षार पर्वत और दो-दो विभंग नदियों के अन्तराल में aai क्षेत्र है । विभंग नदी और वक्षार पर्वत के बीच में सातवां क्षेत्र है । वक्षार पर्वत और वन वेदिका के मध्य में आठवां क्षेत्र है। इस प्रकार चार वक्षार पर्वतों, तीन विभंग नदियों और दो वेदियों के नौ खण्डों से विभक्त होकर आठ क्षेत्र हो जाते हैं । इन आठ क्षेत्रों के नाम इस प्रकार हैं- १. कच्छा, २. सुकच्छा ३. महाकच्छा, ४. कच्छकावती, ५. श्रावर्ता, ६. लांगलावती, ७ पुष्कला और ८. पुष्कलावतो । इन क्षेत्रों के बीच में ग्राठ मूल पत्तन हैं- १. क्षेमा, २. क्षेमकरी, पुण्डरीकशी । ३. अरिष्टा ४. अरिष्टपुरी, ५. खंग, ६ मञ्जूषा ७. श्रौषधी और म प्रत्येक क्षेत्र के बीच में गंगा और सिन्धु नाम की दो-दो नदियां हैं जो नील पर्वत से fनकली हैं और सीता नदी में मिल गई हैं । प्रत्येक क्षेत्र में एक-एक विजयार्द्ध पर्वत है। प्रत्येक क्षेत्र में विजयार्ध पर्वत से उत्तर की ओर और नील पर्वत से दक्षिण को ओर वृपमगिरि नामक पर्वत है। इस पर्वत पर चक्रवर्ती अपनी प्रसिद्धि लिखते हैं ! प्राठों ही क्षेत्र में छह-छह खण्ड हैं- पांच-पांच म्लेच्छ और एक-एक कार्य सण्ड । श्राठों ही आर्य खण्डों में एक-एक उपसमुद्र है। प्रत्येक क्षेत्र में सीता नदी के अन्त में व्यन्तरदेव रहते हैं जो चक्रवतियों द्वारा वश में किये जाते हैं । सीता नदी से दक्षिण दिशा में भी आठ क्षेत्र हैं, पूर्व दिशा में वन वेदी है । वन वेदी के बाद वक्षार पर्वत, विभंगानदी, वक्षार पर्वत, विभंगा नदी, वक्षार पर्वत, विभंगानदी, वक्षार पर्वत और वन वेदी ये क्रम से नौ स्थान हैं । इनके द्वारा विभक्त हो जाने से आठ क्षेत्र हो जाते हैं -- १. वत्सा, २. सुवत्सा, ३- महावत्सा, ४. वत्सकावती, ५. रम्या, ६. रम्यका, ७. रमणीया, प. मंगलावती । इन पाठ क्षेत्रों के मध्य में आठ मूल पत्तन हैं - १. सुसीमा, २ कुण्डला, ३- अपराजिता, ४. प्रभङ्करी, ५. प्रङ्कवती, ६. पद्मावती ७. शुभा व रत्न संचया । श्राठों क्षेत्रों में से प्रत्येक में दो-दो गंगा-सिन्धु नदियाँ बहती हैं, जो निषध पर्वत से निकली है और सीता नदी में मिल गई हैं। आठों क्षेत्रों के मध्य में आठ : उपसमुद्र हैं । निषध पर्वत से उत्तर में और विजयार्द्ध पर्वतों से दक्षिण में आठ वृषभागिरि हैं जिन पर चक्रवर्ती अपने-अपने दिग्विजय के वर्णन की
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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