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________________ minatin . . . अध्याय : सातवां ] [ ४६ करने से भोग भूमि में उत्पन्न होते हैं । सम्यग्दृष्टि जीव वहां से मरकर सौधर्म-ऐशान स्वर्ग में उत्पन्न होते हैं। महाहिमवान् और निषध पर्वत तथा पूर्व और पश्चिम समुद्र के बीच में हरि क्षेत्र हैं। इसके मध्य में वेदाढच नाम का पटहाकार पर्वत हैं। हरि क्षेत्र में मध्यम भोगभूमि की रचना है। " ____ मध्यम भोगभूमि में शरीर की ऊंचाई दो कोस, प्रायु दो पल्य और वर्ण चन्द्रमा के समान होता है। वहां के प्राणी दो दिन के बाद विभीतक (बेहरे के फल के बराबर भोजन करते हैं। कल्पवृक्ष बीस योजन ऊँचे होते हैं । अन्य वर्णन जघन्य भोगभूमि के समान ही है। * निषध नीलः पर्वत तथा पूर्व और पश्चिम समुद्र के बीच में विदेह क्षेत्र है। विदेह क्षेत्र के चार भाग हैं:-१. मेरु पर्वत से पूर्व में पूर्व विदेह, २. पश्चिम में अपरविदेह, ३. दक्षिण में देव कुरु और ४. उत्तर में उत्तर कुरु। विदेह क्षेत्र में कभी जिनधर्म का विनाश नहीं होता है, धर्म की प्रवृत्ति सदा रहती हैं और वहां से मरकर मनुष्य प्रायः मुक्त हो जाते हैं । अतः इस क्षेत्र का नाम विदेह पड़ा। विदेह क्षेत्र में तीर्थकर सदा रहते हैं । यहाँ भरत और ऐरावत क्षेत्र के समान चौबीस तीर्थंकर होने का नियम नहीं हैं । देवकुरु, उत्तर कुरू, पूर्व विदेह और अपर विदेह के कोने में मजदन्त नाम के चार पर्वत हैं । इनकी लम्बाई तीस हजार दो सौ नव योजन, चौड़ाई पांच सौ योजन और ऊँचाई चार सौ योजन है । ये गजदन्त मेरु से निकले हैं। इनमें से दो गजदन्त निषध पर्व की पोर, और दो गजदन्त नील पर्वत की ओर गये हैं । दक्षिण दिग्वी गजदन्तों के बीच में देवकुरु नामक उत्तम भोग भूमि है । देवकुरु के मध्य में एक शाल्मलि वृक्ष है। उत्तर दिग्वर्ती गजदन्तों के बीच में उत्तर कुरु है। . . उत्तर भोग भूमि में शरीर की ऊँचाई तीन कोस, मायु तीन पल्य. और वर्ग उदीयमान सूर्य के समान है । वहाँ के मनुष्य तीन दिन के बाद बेर के बराबर भोजन करते हैं। कल्पवृक्षों की ऊँचाई लीस गब्यूती है । मेरु के चारों प्रोर भद्रशाल नाम का वन है। उस वन से पूर्ण और पश्चिम में निषध और नील पर्वत से लगी हई दो वेदियां हैं। : पूर्व विदेह में सीता नदी के होने से इसके दो भाग हो गये हैं उत्तर भाग और दक्षिण भाग । उत्तर भाग में आठ क्षेत्र हैं। . . . .
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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