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[ गो. प्र. चिन्तामणि हो जाता है । सब युगल दश कोस ऊँचे दश प्रकार के कल्प वृक्षों से उत्पन्न भोगों को भोगते हैं । भोग भूमि के जीव आर्य कहलाते हैं, क्योंकि वहाँ पुरुष स्त्री को प्रार्या और स्त्री पुरुष को आर्य कहकर बुलाती हैं। १. मद्यांग जाति के कल्प वृक्ष मद्य को देते हैं। मद्य का तात्पर्य शराब या मदिरा
से नहीं है किन्तु दूध, दधि, घृत आदि से बनी हुई सुगन्धित द्रव्य को काम___ शक्तिजनक होने से मद्य कहा गया है। . २. वादिनाँग जाति के कल्प वृक्ष मृदंग, भेरी, वीणा आदि नाना प्रकार के बाजों
. ३. भूषणांग जाति के कल्प वृक्ष विविध प्रकार के आभूषणों को देते हैं । ४. माल्यांग नाम के कल्प वृक्ष अशोक, चम्पा, परिजात आदि के सुगन्धित पुष्प
- माला आदि को देते हैं । ... ज्योतिरंग जाति के कल्पवृक्ष सूर्यादिक के तेज को भी तिरस्कृत कर देते हैं। • ६. दीपंग जाति के कान ए माना अवगर के हीरों को देते हैं, जिनके द्वारा लोग ... ... 'घरों के अन्दर अन्धकार युक्त स्थानों में प्रकाश करते हैं।
७. गृहांग जाति के कल्पवृक्ष प्राकार और गोपुरयुक्त रत्नमय प्रासादों का निर्माण ' करते हैं। 5. भोजनांग कल्पवृक्ष छह रसयुक्त और अमृतमय दिव्य आहार को देते हैं । ९. भाजनांग जाति के कल्पवृक्ष मरिण और सुवर्ण थाली, घड़ा आदि बर्तनों को • देते हैं। १०.. वस्त्रांग जाति के कल्पवृक्ष नाना प्रकार के सुन्दर और सूक्ष्म वस्त्रों को देते
- वहां पर अमृत के समान स्वादयुक्त अत्यन्त कोमल चार अंगुल प्रमाण घास होती हैं, जिसको मायें चरती हैं । वहाँ की भूमि पञ्च रत्नभय है । कहीं-कहीं पर मरिण और सुवर्णमय क्रीड़ा पर्वत हैं। वापी, सरोवर और नदियों में रत्नों की सीढ़ियां लगी हैं ! पंचेन्द्रिय तिर्यञ्च मांस नहीं खाते और न परस्पर में विरोध ही करते हैं।
. वहाँ विकलत्रय नहीं होते हैं । कोमल हृदय वाले, मन्दकषायी और शीलादिसंयुक्त मनुष्य ऋषियों को आहारदान देने से और तिर्यञ्च उस पाहार को अनुमोदना