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________________ अध्याय : सातवा ] [ ४८७ ___ जम्बूद्वीप में भरत, हैमवत, हरि, विदेह, रम्यक, हैरण्यवत और ऐरावत ये अनादि निधन नाम वाले सात क्षेत्र है। हिमवान् पर्वत और पूर्व दक्षिण-पश्चिम समुद्र के बीच में धनुष के प्रकार का भरत क्षेत्र है । इसके गंगा-सिन्धु नदी और विजयार्द्ध पर्वत के द्वारा छह खण्ड हो गये हैं। भरत क्षेत्र के बीच में पच्चीस योजन ऊँचा रजतमय बिजयार्द्ध पर्वत है, जिसका विस्तार पचास हजार योजन है । विजयाद्ध पर्वत पर और यांच म्लेच्छ खण्डों में चौथे काल के आदि और अन्त के समान काल रहता है। इसलिये वहाँ पर शरीर की ऊँचाई उत्कृष्ट पाँच सौ धनुष और जघन्य सात हाथ है 1 उत्कृष्ट प्रायु पूर्व कोटि और जघन्य एक सौ बीस वर्ष है। विजयार्द्ध पर्वत से दक्षिण दिशा के बीच में अयोध्या नगरी है। विजयार्द्ध पर्वत से उत्तर दिशा में और क्षुद्र हिमवान् पर्वत से दक्षिण दिशा में गंगा-सिन्धु नदियों तथा म्लेच्छ खण्डों के मध्य में एक योजन ऊँचा और पचास योजन लम्बा, जिनालय सहित सुवर्णरत्नमय वृषभ नाम का पर्वत है । इस पर्वत पर चक्रवर्ती अपनी प्रशस्ति लिखते हैं। हिमवान-महाहिमवान पर्वत और पूर्व-पश्चिम समुद्र के मध्य में हैमवत क्षेत्र है। इसमें जघन्य भोगभूमि की रचना है। हैमवत क्षेत्र के मध्य में गोलाकार एक हजार योजन ऊँचा, एक योजन लम्बा शब्दवान् पर्वत है। जघन्य भोग भूमि में शरीर की ऊँचाई एक कोश, एक पल्य की प्रायु और प्रियंडु के समान श्याम वर्ण शरीर होता है । वहाँ के प्राणी एक दिन के बाद प्रांवला प्रमाण भोजन करते हैं । आयु के नव मास शेष रहने पर गर्भ से स्त्री पुरुष युगल पैदा होते हैं । नवीन युगल के उत्पन्न होते ही पूर्व युगल का छींक और जभाई से मरण हो जाता है । उनका शरीर बिजली के समान विघटित हो जाता है । नूतन युगल अपने अँगूठे को चसते हए सात दिन तक सोधे सोता रहता है। पुन: सात दिन तक पृथ्वी पर सरकता है । इसके बाद सात दिन तक मधुर वाणी बोलते हुए पृथ्वी पर लड़खड़ाते हुए चलता है । चौथे सप्ताह में अच्छी तरह चलने लगता है 1 पांचवें सप्ताह में कला और गुणों को धारण करने के योग्य हो जाता है। छठवें सप्ताह में तरुण होकर भोगों को भोगने लगता है । और सातवें सप्ताह में सम्यक्त्व को ग्रहण करने के योग्य
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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