SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 575
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ IA/ ४८६ ] [ मो. प्र. चिन्तामणि ये द्वीप समुन्द्र चूड़ी के समान गोलाकार हैं। त्रिकोण, चतुष्कोरा या अन्य श्राकार वाले नहीं हैं। . जम्बूद्वीप की रचना और विस्तार तन्मध्ये मेरूमाभिवतो योजन शत सहस्त्र विष्कम्भो जम्बूद्वीपः ॥११६८॥ उन असंख्यात द्वीप समुद्रों के बीच में एक लाख योजन विस्तार वाला जम्बू द्वीप है । जम्बुद्वीप के मध्य में मेरु है, अत: मेरु जम्बूद्वीप की नाभि कहा गया है । जम्बूद्वीप का आकार गोल है। मेक पर्वत एक लाख योजन ऊँचा है। वह एक हजार योजन भूमि से नीचे और ६६ हजार योजन भूमि से उपर है । भूमि पर भद्र शाल बन है । भद्रशाल वन से पाँच सो योजन ऊपर नन्दन वन है। नन्दन वन से प्रेसठ हजार योजन ऊपर सौमनस वन है । सोमनस वन से साढे पैतिस हजार योजन ऊपर पाण्डुकवन है । मेरु पर्वत की शिखर चालीस योजन ऊंची है। इस शिखर की ऊँचाई का परिमाण पाण्डुकवन के परिमाग के अन्तर्गत नहीं है। जम्बूद्वीप का एक लाख योजन विस्तार कोट के विस्तार सहित हैं । जम्बूद्वीप का कोट पाठ योजन ऊंचा है । मूल में बारह योजन, मध्य में आठ योजन और ऊपर भी पाठ योजन विस्तार है। उस कोट के दोनों पाश्चों में दो कोस ऊंची रत्नमयी दो वेदियां हैं। प्रत्येक वेदी का विस्तार एक कोस और एक हजार सात सौ पचास धनुष है । दोनों वेदियों के बीच में महोक्ष देवों के अनादिधन प्रासाद है, जो बक्ष, यापी, सरोवर, जिन मन्दिर प्रादि से विभूषित हैं । उस कोट के पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर चारों दिशाओं में कम से विजय, वैजयन्त, जयन्त और अपराजित नाम के चार द्वार हैं। द्वारों की ऊँचाई आठ योजन और विस्तार चार योजन है। द्वारों के आगे अष्ट प्रतिहार्य संयुक्त जिन प्रतिमायें हैं। जम्बूद्वीप की परिधि तीन लाख सोलह हजार दो सौ सत्ताईस योजन तीन कोस एक सौ अट्ठाईस. धनुष और साढ़े तेरह अंगुल से कुछ अधिक है। क्षेत्रों का वर्णन---- भरत हैमवत हरि विदेह रम्यक हैरण्यक्तेरावत वर्षाः क्षेत्राणि ॥११६६।।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy