________________
।
अध्याय : सातवां
[ ४८५ १. जम्बूद्वीप, १ लवरण समुद्र, २. धातकी खण्ड द्वीप २ कालोद समुद्र, ३. पुष्करवर द्वीप, ३ पुष्करयर समुद्र, ४. वारुणीवर द्वीप, ४ वारुणीवर समुद्र, ५. क्षीरवर द्वीप ५ क्षीरवर समुद्र, ६. धृतवर द्वीप ६ घृतवर समुद्र, ७, इक्षुवर द्वीप ७ इक्षुवर समुद्र, ८, नन्दीश्वर द्वीप ८ नन्दीश्वर समुद्र, ६. अरुणवर द्वीप ६ अरुएबर समुद्र । इस प्रकार स्वयम्भूरमरण समुद्र पर्यन्त एक दूसरे को धेरे हुये असंख्यात द्वीप और समुद्र हैं । अर्थात् पच्चीस कोटि उद्धार पल्यों के जितने रोम खण्ड हो उतनी ही द्वीप समुद्रों की संख्या है।
मेरु से उत्तर दिशा में उत्तर कुरु नामक उत्तम भोग भूमि है। उसके मध्य में नाना रत्नमय एक जम्बू वृक्ष है । जम्बू वृक्ष के चारों ओर चार परिवार वृक्ष हैं । प्रत्येक परिवार वृक्ष के भी एक लाख बयालीस हजार एक सौ पन्द्रह परिवार वृक्ष हैं । समस्त जम्बू वृक्षों की संख्या १४० १२० है। मूल जम्बू वृक्ष ५०० बोजन ऊँचा है । मध्य में जम्बू वृक्ष के होने से ही इस द्वीप का नाम जम्बूद्वीप पड़ा। उत्तर कुरु की तरह देव कुरु के मध्य में शाल्मलि वृक्ष है। प्रत्येक वृक्ष के ऊपर रत्नमय जिनालय है । इसी प्रकार धातकी द्वीप में धातकी वृक्ष और पुष्करवर द्वीप में पुष्करबर वृक्ष है । खोप और समुनों का विस्तार और रचना
द्विद्विविकम्भाः पूर्व पूर्व परिक्षेपिणो वलयाकृतयः ।।११६७।।
प्रत्येक द्वीप समुद्र दूने-दूने विस्तार वाले, एक दूसरे को धेरै हुए तथा चूड़ी के प्राकार वाले हैं।
जम्बूद्वीप का विस्तार एक लाख योजन, लबरण समुद्र का दो लाख योजन, धालकी द्वीप का चार लाख योजन, कालोद समुद्र का आठ लाख योजन, पुष्करवर द्वीप का सोलह लाख चोजन, पुष्करवर समुद्र का बत्तीस लाख योजन विस्तार है। इसी क्रम से स्वयम्भूरमरण समुद्र पर्यन्त द्वीप और समुद्रों का विस्तार दूना है। जिस प्रकार धातकी द्वीप का विस्तार जम्बूद्वीप और लवरण समुद्र के विस्तार से एक योजन अधिक है, उसी प्रकार असंख्यात समुद्रों के विस्तार से स्वयंभूरमरण समुद्र का विस्तार एक लाख योजन अधिक है । पहले पहले के द्वीप समुद्र आगे-आगे के द्वीप समुद्रों को, धेरे हुए हैं । अर्थात् जम्बूद्वीप को लवण समुद्र, लवण समुद्र को धातकी द्वीप, धातकी द्वीप को कालोद समुद्र धेरे हुये हैं । यही क्रम आगे भी है।