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________________ ४८४ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि इन नरकों में मद्यपायी, मांसभक्षी, यज्ञ में बलि देने वाले, असत्यवादी, परद्रव्य का हरण करने वाले, परस्त्री- लम्पटी, तीव्र लोभी, रात्रि में भोजन करने वाले, स्त्री, बालक, वृद्ध और ऋषि के साथ विश्वासत्रात करने वाले, जिनधर्म निन्दक, रौद्र ध्यान करने वाले तथा इसी प्रकार के अन्य पाप कर्म करने वाले जीव पैदा होते है ! उत्पत्ति के समय इन जीवों के ऊपर की ओर पैर और मस्तक नीचे की ओर रहता है । नारकी जीवों को क्षुधा, तृषा आदि की तीव्र वेदना श्रायु पर्यन्त सहन करनी पड़ती है । क्षण भर के लिये भी सुख नहीं मिलता है । अज्ञी जीव प्रथम नरक तक, सरीसृप ( रेंगने वाले ) द्वितीय नरक तक, पक्षी तृतीय नरक तक, सर्प चतुर्थ नरक तक, सिह पांचवें नरक तक, स्त्री छटवें नरक तक और मत्स्य सादें एक तक जाते हैं। यदि कोई प्रथम नरक में लगातार जावे तो आठ बार जा सकता है । अर्थात् कोई जीव प्रथम नरक में उत्पन्न हुआ, फिर वहाँ से निकल कर मनुष्य या तिर्यञ्च हुआ, पुनः प्रथम नरक में उत्पन्न हुआ। इस प्रकार वह जीव प्रथम नरक में ही जाता रहे ती आठ बार तक जा सकता है। इसी प्रकार द्वितीय नरक में सात बार, तृतीय नरक में छह बार, चौथे नरक में पांच बार, पाँचवें नरक में चार बार, छठवें नरक में तीन बार और सातवें नरक में दो बार तक लगातार उत्पन्न हो सकता है । सातवें नरक से निकला हुआ जीव तिर्यञ्च ही होता है और पुन: नरक में जाता है। छठवें नरक से निकला हुआ जीव मनुष्य हो सकता है और सम्यग्दर्शन को भी प्राप्त कर सकता है, लेकिन देशप्रती नहीं हो सकता । पञ्चम नरक से निकला हुआ जीव देशप्रती हो सकता है, लेकिन महाव्रती नहीं । चौथे नरक से निकला हुआ, जीव मोक्ष भी प्राप्त कर सकता है । प्रथम, द्वितीय और तृतीय नरक से निकला हुआ जीव तीर्थकर भी हो सकता है । * मध्यलोक * जम्बूद्रीप लवणोदादय: शुभनामानो द्वीप समुद्राः ।। ११६६ ।। मध्य लोक में उत्तम नाम वाले जम्बूद्वीप आदि और लवण समुद्र आदि असंख्यात द्वीप समुद्र हैं ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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