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________________ अध्याय : दसवां ] [ ८६७ श्रावक को यज्ञांस देकर, उनका सन्मानादिक करना चाहिये। यतो यज्ञांस दानेन् माननीया सुदृष्टिभिः ॥१७६६।।। सोमदेव उपवासकाध्ययन इसमें ऐसा करने में एक अपेक्षा है। श्रावक अपने इस लोक की सिद्धि के याने भोगों के लिये ऐसा करता है, जैसे विद्याधर लोग अथवा चक्रवर्ती आदि लोक करते हैं। विद्याधर लोग विद्याओं व मंत्रों की सिद्धि के लिये जो भी विद्या अथवा मन्त्रों के अधिष्ठाता देव अथवा देवी हैं, उनका पहले पूजा सत्कारादि करके फिर उन मन्त्रों को सिद्ध करते हैं । तब ही ये विद्याएं उनको सिद्ध होती हैं और उनके कार्य की सिद्धि करती है, अगर ये ऐसा नहीं करते तो उनको कभी विद्याएं सिद्ध नहीं हो सकतो। ऐसा नियम है जिससे हमको कार्य कराना हो उसका सत्कारादि करना चाहिए। तद्भच मोक्षगामी नमी विनमि, कुभकरण, मेघनाद, विभिषरणादिक अनेक राजा जो सम्यक दृष्टि थे, उन्होंने भी ऐसा किया भोगों की प्राप्ति के लिये । देखिये प्रकरण आदिपुराण नमि विनाम को धरणेन्द्र के द्वारा राज्य देते समय उपदेश । धरमेन्द्र ने कहा कि ये महाविद्याएं यहां के लोगों को इनकी इच्छानुसार फल दिया करती हैं । यहां विद्याधरों को जो महाप्रज्ञप्ति आदि विद्याएँ सिद्ध होती हैं, वे इन्हें कामधेनु के समान यथेष्ट फल देती रहती हैं वे विद्याएं दो प्रकार की हैं--- कुल जात्याश्रिता विद्यास्तपो विद्याश्चता द्विधाः । कुलाम्नाया गतः पूर्वायले नाराधिताः पराः ॥१७९७॥ तासामाराधनोपायः सिद्धायतन संनिधौ । अन्यत्र वाशुचौ देशे द्विपाद्रि पुलिनादिके ॥१७६८।। सं पूज्य शुचि घेषण विधादेव प्रताश्रितः । महोपवास राराध्या नित्यान पुरः सरैः ।।१७६६॥ सिद्धियम्ति विधिनानेन महाविद्या न भोजुषाम् । पुरश्चरण . नित्यार्चा - जपहोमाधनुक्रमात् ॥१८०० सिद्धविध स्ततः सिद्ध प्रतिमार्थनं पूर्वकम् । विद्या फलानि भोग्यानि वियद गमन चुन्धुभिः ॥१८०१॥ . आदिपुराण पर्व १६ पृष्ठ ४२० संपा. पं. पन्नालाल साहित्याचार्य, सागर
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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