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[ गो. प्र. चिन्तामणि पल्यंकासनं वा कुर्याछिल्मि शास्त्रानुसारतः । निरायुधं राजतं या पैसतं काश्यजं तथा ॥१७६०॥ प्रवालं मौक्तिकं चैव वैडूर्यादिसुरत्नजम् । चित्र तथा लेप्यं कूचिच्चनजं मतम् ॥१७६१॥ प्रातिहार्याष्टकोपेतं संपूरषियवं शुभम् । भावरूपानुविद्धांग करयेतु विबमहतः ।।१७६२।। प्रातिहाविना शुद्ध सिद्धबिम्बमपीरशम् । सूरीणां पाठकानां च साधूनां यथागमम् ॥१७९३॥ वामे च यक्षी बिभ्राणं दक्षिणे यक्षमत्तमम् । नवग्रहानधो भागे मध्ये च क्षेत्रपालकम् ॥१७६४॥ Karni देवतानां सर्वालंकार भूषितम् । स्ववाहनावलोपेतं कुर्यास्सर्वाग सुन्दरम् ।।१७६५।।
यह रीति प्रकृत्रिम प्रतिमाओं को अपेक्षाओं की अपेक्षा अनादि निधन है तथा परम्परा करके भी योग्य है।
... जो लोग धारणेन्द्र पद्मावती सहित (फरणा सहित} श्री पार्श्वनाथ को प्रतिमा से अरुचि करते हैं, वे ठीक नहीं है । जो रीति शास्त्रोक्त है और परम्परा से चली आ रही है, उसमें संदेह नहीं करना चाहिये । जो रीति केवल मन की कल्पना से चलाई गई हो उसमें अत्रि करना ठीक है । प्राचीन जीतनी अर्हन्त प्रतिमायें हैं, वे अष्ट प्रातिहार्य और यक्षयक्षि सहित ही हैं, देवगढ़, सेरोनजी, खजराहो, पपोराजी, थोबनजी, बुदीचंदेरी आदि भारत में कला संस्कृति के केन्द्र हैं, वहां पर जो भी प्रतिमा अरहन्त भगवान की हैं. वह सब इसी प्रकार ही हैं, वर्तमान में सबसे प्राचीन क्षेत्र खारवेल महाराजा के समय का है जो खंडगीरि उदयनीर के नाम से प्रसिद्ध हैं और आगम में भी इसी प्रकार की प्रतिमा बनाने का विधान है सो आगमोक्त ही है।
प्रश्न :- क्या इन देवी-देवताओं की पूजा अर्चना भी करना चाहिये ?
उत्तर :- इन देवी-देवताओं की पूजा अर्चना इनके पद के अनुसार करनी चाहिये, वीतराग भगवान की तरह इनकी पूजा अर्चना नहीं करना चाहिये, क्योंकि ये देव चतुर्थगुणस्थानवर्ती हैं। इनकी पूजा सत्कारादि भी इनी के पद के योग्यतानुसार करना चाहिये । सोमदेव सूरी ने इसीलिये अपने उपासकाध्ययन में लिखा । सम्यग्दृष्टि
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