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अध्याय : दसवां }
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इसलिये कृत्रिम प्रतिमाओं में भी ये चिन्ह प्रवश्य होने चाहिये । किसी-किसी जिन मंदिर में अब भी यक्षादिकों की मूर्ति सहित लगभग दो, दो हजार वर्ष पहले की जिन प्रतिमाएं विराजमान हैं, वे भला अपूज्य कैसे हो सकती हैं ।
कृत्रिम जिन प्रतिमानों के साथ-साथ यक्षादिक वा लक्ष्मी सरस्वती की प्रतिमाओं का निर्णय श्री नेमिचन्द्र सिद्धान्त चक्रवर्ती विरचित त्रिलोकसार में है । तथा जिafia का कथन करते समय लिखा है । यथा
दस ताल मारग लक्खण भरिया पेवंत इव वदन्ता वा । पुरु जिण तुङ्गा पढ़िमा रमणमया भट्ट श्रहियसया ।११७८) १८४॥ चमर करणाम जक्खग बत्तीसं मिहुणगेहि पुहजुत्ता सरिसीए : पंत्तीए गव्भगिहे सुट्ठ सोहति ।।१७८५।। - सिरिदेवी सुद्देवी सव्वान्ह सरणकुमार जक्खाणं । varfar जिनपासे मंगल मंदुबिहमेवि होदी ।। १७८६॥
इस प्रकार लिखा है इसका भावार्थ यह है कि उस गर्भगृह में ( श्रीमंडप में ) एक सौ आठ प्रतिमाएँ विराजमान हैं । वे प्रतिमाएँ दस ताल (धनुष) ऊँची हैं । एक-एक प्रतिमा के दोनों ओर बत्तीस-बत्तीस यक्ष चमर लिये खड़े हैं तथा उन जिन प्रतिमाओं के दोनों प्रोर श्रीदेवी और सरस्वतीदेवी ये दोनों देवियों स्त्री का रूप धारण कर खड़ी हैं, सर्वाल्हाद और सनत्कुमार नाम के यक्षदेव अपने स्वरूप के अनुसार खड़े हैं । उन प्रतिमायों के आगे आठ गुने अष्टमंगल द्रव्यं रक्खे हैं । ये अष्ट मंगलद्रव्य प्रत्येक प्रतिमा के सामने अलग-अलग हैं। इन सब विभूतियों से शोभायमान उन प्रतिमाओं को इन्द्रादिक सम्यग्दृष्टि जीव पूजा करते हैं और वंदना करते हैं ।
ऐसा त्रिलोकसार में लिखा है---
सुमुहूर्ते
नक्षत्रे वाद्यवैभव संयुतः
प्रसिद्ध पुण्यदेशेषु नदीमगवनेषु च ॥ १७८७ सुस्निग्धां कठिनां सुस्पर्शा सुस्वरां शिलाम् । समानीय जिनेन्द्रस्म विवं कार्य सुशिल्पिभिः ॥१७८॥ surfers at ai मश्र रेखा विजतम् । स्थितं प्रलंबितं हस्तं श्रीवत्सादयं दिगम्बरम् ।।१७८६ ॥