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________________ ८६४ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि केवलियों का समुदात करने का नियम नहीं है । जब तेरहवें सयोग केवली नाम के गुणस्थान की स्थिति अन्तर्मुहूर्त बाकी रह जाती है, तब दंडकवाद, प्रतर, पूर्व प्रवर मात्र ऐसे आठ समय में समुदात कर तेरहवें गुण स्थान के अन्तिम समय में अघातिया कर्मों की स्थिति योग निरोधक आयु के बराबर करते हैं फिर कर्मों का नाश करते हुए चौदहवें गुणस्थान के अन्त में मोक्ष प्राप्त करते हैं सो ही वसुनन्दी श्रावकाचार में लिखा हैछम्मा साउग सेसे उध्पां अस्स केवल शापं । सो कुणइ समुग्धायं इदसे पुरण होय वा भखिज्जो ॥१७८॥ तोमुहुत्त सेसा उगम दण्डं कवाड परं च जइय पूरणमथ कबाड़ दंड नियत सुयमाणं च ॥ १७८२॥ एवं पयेसप सरणं संवरणं कुणइ श्रट्ट समयेहि । हो हिति जोइ चरिमे धाइ कम्मारिख सरिसारिए । १७८३॥ इस प्रकार और भी वर्णन है इससे कहना पड़ता है कि जो जीव चौदहवें गुणस्थान में समुध्दात मानते हैं और आठवें समय में मुक्ति जाना बतलाते हैं, के सूखें हैं, वे शास्त्री नहीं हैं । : " प्रश्न --- श्री fat में चौबीसी प्रतिमानों में अगल बगल दोनों थोर श्री देवी अर्थात् लक्ष्मी और सरस्वती मूर्ति रहती है तथा जिनमूर्ति के पास यक्ष यक्षिणी की मूर्ति रहती है; सो यह बात है जिन प्ररहन्त देव की प्रतिमाओं के पास पक्षादिक की व सरस्वती श्रादि की मूर्ति हो उनको नमस्कार करना चाहिये या नहीं, उनकी पूजा करमी. चाहिये या नहीं तथा जिनेन्द्र देव की प्रतिमा के ग्रगल-बगल यक्षादिकों को मूर्ति शास्त्रोक्त है या किसी ने मन से कल्पना कर बनवा दी है ? उत्तर - भगवान अरहन्त देव की प्रतिमा के साथ-साथ यक्षादिक की मूर्तियां अनादिकाल से चली आ रही हैं और अनन्त काल तक रहेंगी। यह कोई मन की कल्पना नहीं हैं, किंतु शास्त्रोक्त है । शास्वत वा अनादिकाल से अनन्तकाल तक रहते Part कृत्रिम जिन प्रतिमाओं में भी इन चिन्हों के रहने का वर्णन है तथा की ग्राम्नाय के अनुसार ही कृत्रिम प्रतिमाएं बनाई जाती है । कृत्रिम प्रतिमा
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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