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अध्याय : दसवां ]
[ ८६३ उपनयावलंबी चादीक्षितौ गूढनैष्टिनाः। श्रावकाध्ययने प्रोक्ताः पंचधा ब्रह्मचारिणः ॥१७७३॥ श्रावकाचार सूत्राणां विचाराभ्यासतस्परः । गृहस्थ धर्म शक्ताश्चोपनय ब्रह्मचारिकः ॥१७७४।। स्थित्वा क्षुल्लक रूपेण कृत्वाभ्यास सदागमे । कुर्याद्विधाहक सांत्रावलंबनाचारिकः ॥१७७५।। बिना दीक्षा व्रताशक्तः शास्त्राध्ययन तत्परः । पठित्वोद्वाहं यः कुर्यात्सोऽदोक्षाब्रह्मचारिकः ।।१७७६॥ पाबाल्यच्छास्त्र सम्प्राप्तिः पित्रादीनां हठात्युनः । पठित्योद्वाहं यः कुर्यात्स गूढ ब्रह्मचारिक: १७७७।। संध्याध्ययन पूजादि कर्मसु तत्परो महान् । स्यागी भोगी दयालुश्च स गृहस्थः प्रकीर्तितः ॥१७७६।। प्रतिमेकादशधारी ध्यानाध्ययन सत्परः ।. प्राक् कषाय विदूरस्थो वानप्रस्थः प्रशस्यते ॥१७७६।। सर्व संग परित्यक्तो धर्मध्यान परायणः । । ध्यानी मौनी तपोनिष्ठः संज्ञानी भिक्षुरुच्यते ।।१७८०॥ . .
इसके सिवाय इन चारों आश्रमों का इसी प्रकार का कथन धर्मामृत श्रावकाचार में, स्वामिकातिकेयानुप्रेक्षा श्रीशुभचन्द्राचार्य कृत उसकी संस्कृत टीका में तथा और भी अनेक शास्त्रों में लिखा है उनमें से इनका विशेष स्वरूप समझ लेना चाहिये । प्रश्न- सात समुद्धातों में से केवली समुखात केवली भगवान के होता है, सो
वह किस गुरणस्थान में होता है।
उत्तर-~जिसकी आयु छह महीने बाकी हो और बाकी के वेदनीय नाम गोत्र इन तीनों कर्मों की स्थिति छह महीने से अधिक हो ऐसे मनुष्य को केवलज्ञान उत्पन्न हो तो वह केवलि समुद्धात करता है । ऐसे केदलियों के सिवाय और केवली समुद्धात करें भी तथा न भी करें।
भावार्थ---जिनकी आयु छह महीने की बाकी रहने पर केवलज्ञान का उत्पन्न हुया; ऐसे केवली तो नियम से समुद्धात करते ही हैं। ऐसे केवलियों के सिवाय अन्य
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