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________________ ८६२ ] [ गा. प्र. चिन्तामरिग धर्म में (गृहस्थों के द्वारा करने व धार्मिक नियमों में) शिपुरण हो उसको उपनय ब्रम्हचारी कहते हैं। जो जब तक विवाह न करे, तब तक क्षुल्लक अवस्था धारण करे, सदा जैन शास्त्रों का अध्ययन करे। अध्ययन समाप्त कर पीछे पारिणग्रहण करे, . उसको अवलंब ब्रम्हचारी कहते हैं । जो बिना दीक्षा लिए ही व्रताचरण करने में लीन हो, जैन शास्त्रों के अभ्यास में तत्पर हो और समस्त शास्त्रों को पढ़कर फिर पारिणग्रहण करे अर्थात् "शास्त्रों का अभ्यास पुर्ण हुए बिना विवाह नहीं करूंगा।" ऐसा नियम लेकर बिना दीक्षा लिए ही जो व्रतों के प्राचरण में प्रवृत्ति करे, उसको अदीक्षित व्रम्हचारी कहते हैं। बालक अवस्था से ही जैन शास्त्रों के अभ्यास करने में जिसका प्रेम हो और जो शास्त्रों को पढ़ चुकने के बाद माता पिता के हठ से विवाह करे । भावार्थ :-"जो स्वयं विवाह न करे किन्तु दूसरे के हठ से जिसको विवाह करना पड़े, उसको गढ़ ब्रह्मचारी कहते हैं। तथा जी जीवन पर्यंत समस्त स्त्री मात्र का त्याग कर देवे और एक वस्त्र मात्र परिग्रह के बिना बाकी सबका त्याग कर देवे सो नैष्ठिक ब्रम्हचारी है। इस प्रकार इनका स्वरुप है। यह बम्हचर्य अवस्था सातवीं प्रतिमा से लेकर ग्यारहवीं प्रतिमा तक समझना चाहिए। आये गृहस्थ का दूसरा वर्णाश्रम लिखते हैं। ___ जो त्रिकाल बंदना तथा पूजा आदि छह कर्मों के करने में तत्पर हो जो विषय कषाय और हिंसादिक पापों का त्यागी हो, जो स्वात्मरस का (अपने शुद्ध प्रात्मा के प्रानन्द रस का) भोगी हो, जो दयालु हो उसको गृहस्थ कहते हैं, अभिप्राय यह है कि अणुव्रत गुणव्रत शिक्षाबत इन बारह व्रतों को पालन करने वाला हो उसको गृहस्थ कहते हैं । जो ग्यारह प्रतिमाओं को पालन करता हो, जो ध्यान और अध्ययन करने में सदा तत्पर हो, अनंतानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ इन चारों कपायों से रहित हो उसको वानप्रस्थ कहते हैं। तथा जो हिंसा आदि समस्त पापों का जीवन पर्यंत के लिए त्यागी हो, पंच महादत प्रादि अठाईस मूलगुणों को धारण करने वाला हो, धर्मध्यान में लीन हो, ध्यानी हो, मौन धारण करने वाला हो और तपस्वी हो उसको भिक्षुक कहते हैं। भावार्थ :--महामुनियों को भिक्षुक कहते हैं। इस प्रकार चारों वरणश्रिमों का स्वरूप जनना । सो ही धर्मरसिक नाम के शास्त्र में लिखा है- . SENAance
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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