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सकतनाह . .
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अध्याय : दसवां ]
[ ८६१ उत्तर :- इस लोक के मर्यादा बातवलय के अन्त तक ही है, आगे अलोका. काश है । अलोकाकाश में केवल शून्य रूप प्राकाश के सिवाय और कोई पदार्थ नहीं है । जीव पुद्गल धर्म अधर्म काल इन पांचों द्रव्यों का अभाव जिस प्रकाश में हो उसको अलोकाकाश कहते हैं । तथा यमन करने में सहायक होने की शक्ति धर्मास्तिकाय में है और अलोकाकाश में धर्मास्तिकाय नहीं है। इसलिए धर्मास्तिकाय का अभाव होने से प्रागे अलोकाकाश में अर्ध्वगमन नहीं होता। अतएव मुक्त जीव की स्थिति लोक के अन्त पर्यंत ही रहता है, साही तत्वार्थ सूत्र में लिखा है, "धर्मास्तिकायाभावात्" अर्थात् धर्मास्तिकाय का अभाव होने से प्रागे सिद्धों का गमन नहीं होता। प्रश्न :-मुनिराज एकाग्रचित्त होकर ध्यान करते हैं, सो उस ध्यान की
स्थिति कितनी है? उत्तर :- शरीरादिक बाह्य पर पदार्थों के चित्तवन कर निरोध कर अपनी आत्मा के स्वरूप में एकाग्रता का चितवन शुद्ध ध्यान है। वह धर्मध्यान शक्लध्यान. के भेद से दो प्रकार का है, वह बनवृषभनाराच, वज्रनाराच भौर नाराच इन तीनों उत्तम संहननों को धारण करने वाले जीवों के होता है । इनमें भी वनवृषभनाराच नाम के प्रथम संहनन को धारण करने वाले जीवों के वह ध्यान अन्तर्मुहूर्त तक रहता है, इससे अधिक नहीं ठहर सकता है सो ही तत्वार्थ सूत्र में लिखा है- . उत्तम संहननस्यैकाग्रचिता निरोधो ध्यानमान्तर्मुहूर्तात ।।अध्याय ६ सूत्र २७।।
प्रश्न :--जैन धर्म में चार आश्रम स्थापन किये गये हैं, सो वे कौन-कौन हैं
. . और उनका स्वरूप क्या है ? .. . . . . . उत्तर :-उपासकाध्ययन नाम के सातवें अंग में पाश्रम चार प्रकार के वतलाये हैं । ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और भिक्षुक । आश्रमों के ये भेद क्रियाओं के भेद से होते हैं, सो ही प्रश्नोत्तर श्रावकाचार में लिखा है--ब्रह्मचारी मही, वानप्रस्थो भिक्षुक सत्तमः । चत्वारो ये क्रिया भेदादुक्ता वर्णवदाश्रमाः । इन चार प्रकार के चरणश्रिमों में से पहले ब्रह्मचारी के पांच भेद हैं---उपनय ब्रह्मचारी, अवलंब ब्रम्हचारी, प्रदीक्षित अम्हचारी, गूढ ब्रम्हचारी और नैष्ठिक अम्हचारी। इनके अन्त में ब्रम्हचारी शब्द सबके साथ लगा हुआ है। इनका विशेष स्वरूप इस प्रकार है जो श्रावकाचार सूत्र का विचार करे, विद्याभ्यास करने में सदा तत्पर रहे और गृहस्थ
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