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[ गो. प्र. चिन्तामणि तिष्ठ बनता है । सम्पूर्वक निपूर्वक धि धातु का अर्थ निकट होता है । यज् धातु का अर्थ पूजा करना है । इसी से याग वा इज्या बनता है । जिसका अर्थ पूजा करना है । तथा जः इस बीजाक्षर का अर्थ गमन करना है अथवा गच्छ शब्द गम् धातु से बना है और उसका अर्थ भी जाना है। इस प्रकार इन पांचों उपधारों के वाचक शब्दों का धात्वर्थ धातु से बना हुआ अर्थ बतलाया । प्रश्न :-ग्रहस्थ के द्वारा होने वाली भगवान श्रहंत देव की पूजा में छह
कियायें सुनी जाती है सो कौन-कौन हैं ? . उत्तर :- सबसे पहले जलादिक पंचामृत से भगवान अरहंत देव का स्नपन वा अभिषेक करना सो पहली क्रिया है। अभिषेक के बाद पहले कही हुई विधि के अनुसार पंचोपचारी पूजा करना सो दूसरी क्रिया है । पूजा के बाद उनका स्तोत्र पाठ करना, सो तीसरी क्रिया है। स्तुति के बाद इनके वाचक मंत्रों के द्वारा १०८ बार जप करना सो चौथी क्रिया है। तदनंतर कायोत्सर्ग धारण कर उनका ध्यान सो पांचवी क्रिया है। शास्त्रों के द्वारा ५ प्रकार का स्वाध्याय करना सो छठी क्रिया है। इस प्रकार पूर्वाचार्यो में देवसेना (देवपूजा करने के लिए गृहस्थों को छह क्रियानों के करने का उपदेश दिया है। सो हो यशस्तिलक नाम: के महाकाव्य में लिखा है'स्नपनं पूजनं स्तोत्रं जपं श्रुतिश्रवम् क्रिया षडुदिताः सद्भिःदेवसेवासु गेहिनाम्" प्रश्न :--पाठों कर्मों को नाश कर सिद्ध भगवान निरन्तर सिद्धालय में
विराजमान रहते हैं। सो वह सिद्धालय लोक के अग्रभाग पर
..है या वातवलय के भीतर है या वातवलय के ऊपर है ? . उत्तर .-यह तीनों लोक धनवात धनोदधिवात और तनुवात ऐसे तीन वातवलयों से घिरा हुआ है । - इन तीनों वातबलयों में से तीसरे लनुवांतबलय में पैंतालीस लाख योजन प्रमाण सिद्धालय सुशोभित है। वहां पर सिद्ध परमेष्ठी विराजमान रहते हैं। पंचमंगल भाषा में भी लिखा है। "लोक शिखर तनुवातवलय में संठया ।" इस प्रकार और भी जैन शास्त्रों में लिखा है। .... प्रश्न :-इस जीव का ऊर्ध्वगमन स्वभाव है परन्तु मुक्त जीव वातवलय
में लोक के अन्त तक आते हैं, आगे नहीं जाते, सो इसका पया कारमा है, वे यहीं तक क्यों रह जाते हैं ?
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