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________________ अध्याय : दसवां ] है ६५९ पंचोपचारी पूजा का स्वरूप-- . ... आह्वाहन, स्थापन, सन्निधिकरण, पुजा और विसर्जन ये पांच पूजा के उपचार या अंग कहलाते हैं । इनका स्वरूप इस प्रकार है--जो अरहन्तदेव आदि की पूजा के समय मंत्र पढ़कर उनका आह्वाहन करना उसके लिये पुष्प अक्षत प्रादि स्थापन करना सो पहला अाह्वानन नाम का उपचार है। आह्वानन के बाद मंत्र पढ़कर तथा पुष्प अक्षत आदि के द्वारा उन पूज्य अरहतादि को अपने समीप करना सो समिधिकरण नाम का तीसरा उपवार है। तदनंतर जल चन्दन अक्षत पूष्प नैवेद्य दीप धूप फल अर्धदि से मंत्र पूर्वक प्राध्य पारि की पूजा करना सो चौथा पूजा नाम का उपचार है । तथा पूजा करने के बाद स्तुति जप वंदना आदि करके मंत्र पढ़कर और पुष्प अक्षत आदि क्षेपण कर उनका विसर्जन करना सो विसर्जन नाम का पाँचमा उपचार है । इस प्रकार पंचोपचारी पुजा का स्वरूप जानना सोही लिखा है...... ॐही अर्हन् श्री परमब्रह्मन् अत्रावतरावतर संवौषट् । इति माह्वाननम् ।। ॐ ह्रीं अर्हन् श्री परमब्रह्मन् अत्र तिष्ठ ः ठः स्थापनम् । ॐ ह्रीं अर्हन् श्री परमब्रह्मन् अत्र मम् सन्निहितो भव भव वषट् इति सन्निधापनम् । ॐ ह्रीं श्री परमब्रह्मरणे अनंतानंत ज्ञानशक्तये अष्टादशदोषरहिताय बट चत्वारिंशद गुर विराजमानाय महत्परमेष्ठिने जलं निर्धामीति स्वाहा । .......... __ इस प्रकार चन्दन, अक्षन, पुष्प नैवेद्य धूप फल अर्घ प्राद्रि द्रव्य चढ़ाते समय बोला जाता है तथा विसर्जन करते समय यह पढ़ा जाता है--- ॐ म्हों ग्रहन श्री परमब्रह्मन् स्वस्थान् गच्छ-गच्छ जः जः जः । इस प्रकार पंचोपचारी पूजा का स्वरूप. “पूजासार' तथा प्रतिष्ठा पाठ और जिनसंहिता आदि समस्त पूजाओं के पाठों में लिखा है । इसलिये शास्त्र गुरु प्रादि की पूजा भी इसी रीति से समझनी चाहिये, अर्थात इनकी पड़ा भी पंचोपचारी करनी चाहिये। ___ कदाचित् यहां पर कोई यह पूछे कि पंचोपचार के शब्द किस-किस धातु से बने हैं । इसका उत्तर यह है कि आह्वानन शब्द बज् धातु से बना है हम धातु का अर्थ अाह्वानन वा बुलाना है । स्थापन शब्द स्था धातु से बना है स्था धातु का अर्थ गतिनिवृत्ति वा टहरना है । उसका पंचमी वा लोट का मध्यम पुरुष का एकवचन
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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