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[ गो. प्र. चिन्तामरिय
इसका भी अभिप्राय यह है कि महामुनियों के यमरूप त्याग की मुख्यता है । नियंस रूप त्याग की गौता है तथा श्रावकों के नियम रूप त्याग की मुख्यता है और यमरूप त्याग की गौरता है ।
उपवास का लक्षण ---
उपवास धारण करने वाले भव्यजीव उपवास धारण करने के समय से लेकर पहर तक, १२ पहर तक अथवा सोलह पहर तक क्रोध मान माया, लोभ रूप इन चारों कषायों का सर्वथा त्याग कर देते हैं । स्पर्शन, रसना, घ्रारण, चक्षु, श्रोत इन पांचों इन्द्रियों के स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, शब्द इन विषयों का सर्वथा त्याग कर देते हैं और स्वाद्य, स्वाद्य, अवलेह पान इन चारों प्रकार के श्राहारों का सर्वथा त्याग कर देते हैं इन सबके त्याग करने को उपवास कहते हैं । जो लोग क्रोधादि कषायों का त्याग किये बिना ही केवल भोजन पानादिक का त्याग कर देते हैं और उसको उपवास कहते हैं, सो मिथ्या है। जैनधर्म के अनुसार यह उपवास नहीं किन्तु लंघन कहलाता है । सो ही स्वामी कार्तिकेयानुप्रेक्षा में लिखा है -
उपवास कुवंतो प्रारम्भ जोकरेदि मोहायो ।
सो हिदेहं सोसदिप भाए कम्मसेपि ॥ १७७२ ॥
इसकी टीका में लिखा है
कषायविषयाहारत्यागो यत्र विधोयते ।
उपवासः स विज्ञेयशेषं लंघनकं विदुः ।।
इसके सिद्ध होता है कि कषाय इन्द्रियों के विषय और सब तरह के प्रारम्भ और चारों प्रकार के प्रहारों का त्याग करना ही उपवास है । और यदि किसी के ऊपर लिखे अनुसार उपवास करने की शक्ति न हो तो वह बीच में जल पी लेवे तो उसको कैसा फल लगता है ?
पहली बात तो यह है कि उपवास तो ऊपर लिखे अनुसार ही करना चाहिये । यदि कोई हीनशक्ति वाला कोई उपवास के दिन जल पी ले तो उसके आठवां भाग नष्ट हो जाता हैं । यह बात प्रश्नोत्तरोपाकाचार नाम के ग्रन्थ में प्रवास के कथन करते समय लिखी है-
arraria हीयेत भागश्चाष्टमों नृणाम् ।
उपवासस्य तस्मान्तीरं त्यजेत्सुधीः ॥१७७३॥