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अध्याय : दसवां ]
[ ८५७ मोक्षमार्ग अनादि काल से है। संसारराशि के जीव अनादिकाल से संसार का नाश कर मोक्ष प्राप्त करते पा रहे हैं। वर्तमान में भी विदेहक्षेत्र से जाते हैं। तथा आगे भी अनंतकाल तक जाते रहेंगे, परन्तु फिर भी सिद्ध राशि बढ़ती नहीं और निगोद राशि घटती नहीं सिद्ध राशि और निगोद राशि वैसी की वैसी ही अनंतानंतरूप बनी रहती है । सो यह कहना किस प्रकार सिद्ध हो सकता है क्योंकि जो पदार्थ जहाँ से निकलता है वहां घटना चाहिये और जहाँ जाता है वहां बड़ना चाहिये। इस हिसाब से सिद्ध राशि बढ़नी चाहिये और निगोद राशि घटनी चाहिये ।
इस संसार में निगोद राशि असंख्यात लोक प्रमाण है और एक-एक निगोद राशि में अनंतानंत निगोदियां जीव निवास करते हैं । उन अनंतानंत जीवों में से. यदि किसी जीव ने शाहर मापन का मालिक हो तो वह जीव वहां से निकलकर द्विन्द्रीय आदि बस पर्याय में आकर. उत्पन्न होता है । उस निगोद राशि में से जितने जीव निकलकर उस पर्याय धारण कर संसार को. व्यवहार राशि में आते हैं। उतने ही जीव व्यवहार राशि से निकलकर समस्त कर्मों का नाश कर मोक्ष चले जाते हैं । इस प्रकार व्यवहार राशि उतनी की उतनी ही बनी रहती है । इस प्रकार जैनशास्त्रों में भगवान जिनेन्द्रदेव ने कहा है । सो सर्वथा निःसन्देह. हैं । इसका उदाहरण देकर समझाते हैं । जैसे- पद्मद्रह प्रादि छहों द्रहों से गंगा सिंधु आदि चौदह नदियां निकलती है । तथा अनादिकाल से उन द्रहों में से पानी निकलता रहता है । और समुद्रों में पड़ता रहता है । तो भी वहाँ का पानी घटता नहीं दश, बीस, चालीस योजन महरा बना ही रहता है । भूत, भविष्यत् वर्तमान किसी भी काल में उन द्रहों का पानी नहीं घटता तथा समुद्र का जब कभी बढ़ता नहीं समुद्र की मर्यादा भी अनादिकाल से अनंतकाल तक जैसे की तैसे बनी ही रहती हैं । अथवा आकाश से जल की वर्षा होती है । और वह सब समुद्र में जाती है। तो भी प्रकाश में जल घटता नहीं और समुद्र में बढ़ता नहीं इस प्रकार और भी उदाहरण हैं। यम नियम का अर्थ---
. अपने जीवन पर्यन्त पापों का त्याग करना यम है.। और एक मुहर्स, एक दिन, एक महिना, २ महिना वर्ष दो वर्ष प्रादिकाल की मर्यादा लेकर पापों का त्याग करना सो नियम है । सो ही रत्नकरण्ड श्रावकाचार में लिखा है.......
नियमापरमितकालो यावज्जीवं यमो ध्रियसे । : ........... .. ...
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