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अंगुष्ठ जपो मोक्षाय उपचारे तु तर्जनी, शान्यर्थं तु अनामिका
अंगुष्ठ जापो मोक्षाप उपचारे तु तर्जनी, मध्यमा धriterra कनिष्ठा सर्वसिद्धिदा ।।१७६६ ।।
[गो. प्र. चिन्तामरि
इस प्रकार यह जप करने की विधि बतलाई है सो समयानुसार इस विधि
^ के अनुसार जप करना चाहिये ।
यदि जप करते समय किसी कारण से विघ्न श्री जाय तो उसका प्रायश्चित किस प्रकार करना चाहिये ?
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स्नान कर धोती दुपट्टा ये दो वस्त्र पहनकर सदाचार पूर्वक जप करने के लिये . बैठना चाहिये और उस समय इन बातों का त्याग कर देना चाहिये जो अपने व्रतों से भ्रष्ठ हो गया है उसका तथा शुद्र का देखना, इन दोनों के साथ बात करना, इन दोनों के बचन सुनना, छींक लेना, अधोवायु निस्सरण, जंभाई लेना, यदि जप करते समय से ऊपर लिखी बातें हो जाय तो उसी समय जप छोड़ देना चाहिये । और फिर आचमन और षडंग छह अंगों से सुशोभित प्राणायाम कर बाकी बचे हुये जप को अच्छी तरह करना चाहिये । यदि आचमन और प्राणायाम न हो सके तो भगवान जिनेन्द्रदेव के दर्शन कर पीछे जप करना चाहिये । जप के ऐसे विघ्नों की शुद्धि वा प्राणायाम से होती है । यदि श्राचमन प्राणायाम न बन सके तो भगवान के दर्शन कर शुद्धि कर लेनी चाहिये | विघ्न आ जाने पर बिना शुद्धि किये जप नहीं करना चाहिये । सो ही धर्मरसिक में लिखा है-
व्रतच्युतान्त्यजातीना दर्शने भाषणे श्रुते ।
सुतेऽधवातगमने जंभये जप मुत्सृजेत ॥। १७७०॥ प्राप्तावाम्यते तेषां प्राणायाम षडंगकम् |
कृत्वा सम्यक् जपेच्छेषं यद्वा जिनादिदर्शनम् ।।१७७१ ।।
इससे सिद्ध होता है कि ठीक अधोवात यादि विघ्न या जाने पर प्राणायाम आचमन वा जिनदर्शन कर फिर बाकी का जप पूर्ण करना चाहिये | जो श्रावक जप करते समय प्रमादी होकर ऊंघते हैं । नींद का भोका लेते हैं अथवा बार-बार उवासी लेते हैं अथवा और किसी प्रकार का प्रमाद करते है । उनका जप करना न करने के समान है ।