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अध्याय : दसवां ]
[ ८५५ रक्तवस्त्रं परं श्रेष्ठं प्राणायामविधों ततः। सर्वेषां धर्म सिद्धयर्थं दर्भाषनं तु बोत्तमम् ।।१७६६॥
इसके सिवाय हरिवंश पुराण में लिखा है कि श्री कृष्ण ने समुद्र के किनारे तेला स्थापन कर डाभ के आसन पर बैठकर अपने कार्य की सिद्धी की। तथा प्रादि पुराण में जो गर्भान्वय आदि क्रियायें लिखी है। उनमें भी डाभ के आसन का ही विशेष वर्णन लिखा है। इससे सिद्ध होता है कि डाभ का आसन ही सबसे उत्तम है।
प्रश्न :---ऊपर लिखे मंत्र का जप किस तरह करना चाहिये ।
उत्तरः ---अपने घर में जप करने का फल एक गुरणा है। बन में जप करने का फल सौ गुणा है । यदि पवित्र बाग में या किसी वन में जप करे तो उसका फल हजार मुरगा । यदि जिन मन्दिर में जप करे तो उसका फल करोड़ गुणा है। यदि भगवान जिनेन्द्र देव के समीप जप करे तो अंनत गुणा फल है । यही बात धर्मरसिक नाम के ग्रंथ में लिखी है
गहे अपफलं प्रोक्तं बने शतगुणं भवेत् । ... पुण्यारामे सधारण्ये सहस्त्रगुरिगतं मतम् ॥१७६७।। पर्वते यशसहस्त्र नद्यां लक्षभुवाहृतम् । . कोटि देवालये प्राहुरनन्तं जिन सन्निधौ ।।१७६८।।
इससे सिद्ध होता है कि घर, वन, बाम आदि जगहों से भगवान जिनराज के निकट जप करने से अन्नतगुरणा फल प्राप्त होता है।
जप करने का विधान इस प्रकार हैं---मोक्ष की प्राप्ति के लिये अंगूठे से जपना चाहिये । औपचारिक कार्यों में तर्जनी उगुली से (अंगूठे के पास वाली अंगुली) जपना चाहिये । धन और सुख की प्राप्ति के लिये. मध्यमा व बीच की उगुली से जप करना चाहिये, शांति कर्म में किसी ग्रह व उपद्रव को शांत करने के लिये अनामिका उंगुली से (बीच की उगुली के पास बाली) चाहिये तथा अाह्वानन करने के लिये कनिष्ठा उंगुली (सबसे छोटी उंगुली ) से जपना चाहिये, शत्रु को नाश करने के लिये तर्जनी उंगुली से धन संपदा के लिये मध्यंमा से, शांति के लिये अनामिका से
और और सभी कार्यों की सिद्धि के लिये कनिष्ठा से जपना चाहिये। इस प्रकार अलगअलग उगुलियों से जप करने का फल बतलाया है । लिखा भी है