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________________ ८६८ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि 'एक तो ऐसी विद्यायें हैं जो कुल ( पितापक्ष ) अथवा जाति (मातृपक्ष ) के आश्रित हैं और दूसरी वे हैं जो तपस्या से सिद्ध की जाती है। इनमें से पहली प्रकार की विद्यायें कुल परम्परा से ही प्राप्त हो जाती है । और दूसरे प्रकार की विद्यायें यत्नपूर्वक आराधना करने से प्राप्त होती हैं । जो विद्यायें श्राराधना से प्राप्त होती हैं उनकी आराधना का उपाय यह है कि सिद्धायतन के पास या द्वीप पर्वत या नदी के किनारें श्रादि किसी अन्य पवित्र स्थान में पवित्र वेषधारण कर ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुये विद्या के अधिष्ठातृ देव-देवी की पूजा करे तथा नित्यपूजा पूर्व महोपवास धारण कर उन विद्याओं की आराधना करे इस विधि से तथा नित्य पूजा जप होम आदि अनुष्ठान करने से विद्याधरी की वे महाविद्याय सिद्ध हो जाती हैं। जिन्हें विद्यायें सिद्ध हो गई हैं ऐसे प्रकाशगामी विद्याधर लोग पहले सिद्ध भगवान की प्रतिमा की पूजा करते हैं और फिर विद्याओं के फल का उपभोग करते हैं । इस प्रकार धरणेन्द्र के द्वारा प्रदत्त राज्य पाकर और विद्या सिद्ध करने का उपाय जानकर दोनों कुमार अत्यन्त ग्रानन्दित हुये धरोन्द्र भी अपना कार्य पूरा हुआ सम अपने पाताल लोक को लौट गया । पश्चात् उन दोनों कुमारों ने विधिपूर्वक अनेक विद्यार्थी सिद्ध की और विद्या में बड़े-बड़े पुरुषों के साथ मिलकर अपने अभिलषित अर्थ को सिद्ध किया, दे दोनों कुमार विद्याओं के श्राश्रय से प्राप्त तथा छहों ऋतुयों के सुख देने वाले भोगों को भोगने लगे । निमि और नमि तद्भव मोक्षगामी जीवों ने भी विद्यायें सिद्ध की निम्न श्लोक से प्रमाणित है कि सम्यक्त्व भी आवश्यकतानुसार विद्यायें सिद्ध कर अपने atter जीवन की सफलता प्राप्त करते थे । fafeteriमानयन्तौ । farartefa विद्यावृद्ध : सममभि मतामर्थं सिद्धि प्रसिद्धिम् ॥ १८०२॥ famratara पडतु सुखदान्निविशन्तौ च भोगान् । तौ तत्रादौ स्थितिम भजतां खेचरैः संविभक्ताम् ।।१८०३|| ० जिनसेro प्रादिपुराण पर्व १६ पृष्ठ ४४३
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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