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अध्याय : दसवां .
उपरोक्त कथन से प्रमारिणत हुआ कि तद्भव मोक्षगामी जीव भी इह लोक सिद्धि के लिये विद्याएं सिद्ध करते थे और जब जो विद्यार्य सिद्ध करती होती. उस विद्या के अधिष्ठाता देव या देवी की पूजा विनय आदर सम्मान भी करना.पड़ता था । वर्तमान समय में अगर कोई सदगृहस्थ किसी मंत्र विद्या का सहारा लेकर अपने ऐहिक कार्य की सिद्धि कर लेता है तो क्या वह जीव अभव्य या मिश्यादृष्टि की कोटि में आ जायेगा ? नहीं आयेगा, क्योंकि उसका हेतु विद्या सिद्धि करने का है । और उन विद्याओं के सहारे से अपने पर पाया संकट धर्मसंकट अथवा दूसरों पर प्राया संकट दूर करने का है। ..
.. ___ वर्तमान में कुछ पंडित लोग अथवा विशेष प्रागमाभ्यास शून्य साधु लोग कहते हैं कि मंत्र विद्या वा यंत्र विद्या का प्रयोग करना कराना सहारा लेना मिथ्यात्व है क्योंकि प्रत्येक मंत्र विद्या का अधिष्ठाता देव होता है और उस देव का पूजन अर्चन करना आवश्यक होता है। सम्यदृष्टि बोतरागदेव को छोड़कर अन्य किसी को नहीं पूजता है।
यहां प्रश्न है कि उपरोक्त कथन में नामि विनमि राजकुमार क्या मिथ्यादृष्टि थे अथवा अभय थे, जो उन्होंने विद्याऐं सिद्ध की और उनके अधिष्ठाता देव की पूजा अर्चा की, क्या जिनसेन स्वामिजी ने प्रादिपुराण में प्रसद् निरुपण किया है ? विद्वान विचार करें।
हमें प्राचार्यों के मन्तव्यों की और ध्यान देना चाहिये पंडितों के मंतव्यों की ओर नहीं, कुछ गृहस्थ पंडितों ने अपनी परम्परा का पोषण करने के लिये ही निषेध किया है ।
प्रागे विरनन्दी स्वामी एक स्त्रोत बनाने के पहले शासन देव के विषय में अपना मन्तव्य लिखते हैं ?
"स्त्रोत को प्रारम्भ में शंका समाधान करने हुये लिखते हैं....
काव्यं श्रीमद्गीति न तुच महत: "सूरे" लपस्विनोऽस्मिन् स्तवकरणे कथं सम्यक्त्व शुद्धि जातेती प्रश्ने प्रत्युत्तरमार मोक्ष मार्ग प्रत्युद्यतस्य सम्यक्त्वस्य सहितस्य तपस्विनो मुनेः सम्यक्त्वधनिका जांतास्त्वनतिमोत्रमार्गाहेत्वेन तस्य समुधमो न तस्य तु मित्त्यमत्कारकारी चितापेक्षा श्रावकारणां यथोपदिष्ट धाभिलषित-समीहित
यापकानाSSAnne-ara
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