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[ गो. प्र. चिन्तामणि
प्रणाम किया था, मुनिराज की वन्दना बाद में की थी। उस देव ने कहा था जिन धर्मोपदेशक: चारुदत्तो साक्षात् गुरुः' जिन धर्म का उपदेश देकर मेरी आत्मा का उद्धार करने वाले चारुदत्त मेरे साक्षात गरु हैं, क्योंकि 'दतः पंचनमस्कारो मरणे करणावता' (२१-१५०) उन्होंने करुणापूर्वक मुझे मरण समय पर पंच नमस्कार मंत्र प्रदान किया था।
जातोऽहं जिन धर्मेण सौधर्मो विबुवोत्तमः । चारुदत्तो गुरुस्तेन प्रथमो नमितो मया ॥१६२६॥
जिन धर्म के प्रभाव से मैं सौधर्म स्वर्ग में महान देव हुमा हूँ। इस कारण मैंने अपने गुरु चारुदत्त को सबसे पहले प्रणाम किया है । हरिवंश पुराग की यह शिक्षा चिरस्मरणीय है :
अक्षरस्यापि चैकस्य पदार्थस्य पदस्य था । दातारं विस्मरन् पापी कि पुनर्धर्मदेशिनम् ।।१६२७॥
एक अक्षर का अथवा एक पद का या पदार्थ के दाता को विस्मरण करने वाला पापी है, तब फिर धर्म के उपदेशक को भूलने वाला महान पापी क्यों न होगा ?
__ इस कथन के प्रकाश में अरहन्त भगवान का अनन्त उपकार सर्वदा स्मरणीय है और उनके चरण युगल सर्व प्रथम वन्दनीय हैं ।।
__ प्राचार्य वीरसेन ने अरहन्त भगवान के सम्बन्ध में यह सुन्दर गाथा धवला टीका में उद्धृत है :---- .
तिरयण तिसूल धारिय मोहं धासुरक बंधविदहरा । सिद्धसयलप्परुवा अरहंता दुप्पणयकयंता ॥१६२८॥
जिन्होंने रत्नत्रय रूप त्रिशूल को धारण कर मोह रूपी अंधकासुर के कबंध चन्द का हरण किया है और अपने सकल प्रात्म स्वरूप को प्राप्त कर लिया है, वे. मिथ्या पक्षों के विनाश करने वाले अरहन्त भगवान हैं ।
मूलाचार में लिखा है कि ये अरहन्त भगवान जगत में त्रिविधतम अर्थात् तीन प्रकार के अन्धकारों से विमुक्त हैं, इस सम्बन्ध की गाथा विशेष महत्त्वपूर्ण है--
मिच्छत्तवेदीयं पारणावरणं चरित मोहं च । तिविहा तयाहु मुक्का तम्हा ते उत्तमा होति ॥१६२६॥