SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 784
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ अध्याय आठवा ] [ ६६५ ये चौबीस तीर्थङ्कर लोक में उत्तम कहे गये हैं, क्योंकि ये मिथ्यात्व वेदनीय, ज्ञानावरण तथा चारित्र मोहनीय इन तीन प्रकार के अन्धकारों से मुक्त हैं । संस्कृत टीकrare वसुनन्दि सिद्धान्त चक्रवर्ती ने लिखा है, "त्रिविधं तमस्तस्मात् मुक्ता यतस्तस्मात्ते उत्तमाः प्रकृष्टा भवन्ति ।" इसका भाव यह है कि अरहन्त भगवान मिथ्यात्व अंधकार से रहित होने से सम्यक्त्व ज्योति से शोभायमान हैं । ज्ञानावरण के क्षय होने से केवलज्ञान समलंकृत हैं । चारित्र मोह के प्रभाव होने से परम यथाख्यात चारित्र संयुक्त हैं । मिथ्यात्व अज्ञान तथा असंयम रूप अन्धकार के होते हुए यह जीव परमार्थ दृष्टि से उत्तम ( उत् अर्थात् रहित + लम अन्धकार ) अर्थात् अन्धकार रहित नहीं कहा जा सकता है। लोक में श्रेष्ठ पदार्थ को उत्तम कहते हैं । तत्त्व दृष्टि से मुमुक्षु जीव अरहन्त भगवान को उत्तम अर्थात् उत्तम मानता है । मोहनीय कर्म पाप प्रकृति है । इसके भेद राग भाव को भी पाप रूप मानना होगा, किन्तु वह रागभाव अरहन्त भगवान तो वह जीव को कुगतियों से बचाकर परम्परा से मोक्ष का अतः मूलाचार में 'अरहंतेषु यत्रो --स सत्थराम्रो राग प्रशस्त राग अर्थात् शुभ राग कहा है, (देखो गाथा ७३, ७४ षडावश्यक अधिकार ) के विषय में होता है, कारण हो जाता है, अरहन्तों में किया गया अरों को नमस्कार करने से जीव सम्पूर्ण दुःखों से छूट जाता है । जो यह सोचते हैं कि अरहन्त का स्मरण करने से मन में संग भाव होता है, वह FE का वर्धक ही होगा । उससे आत्मा का कल्याण नहीं हो सकता है | यह धारणा सद्विचार, विवेक तथा आगम के प्रकाश में भ्रम मूलक प्रमाणित होती है । वीतराग की भक्ति के द्वारा श्रात्मा में लगा हुआ अनादि कालीन मोहज्वर दूर हो जाता है । धर्मशर्माभ्युदय में एक सुन्दर बात कही गई है जिनेन्द्र देव के चरण कमल की भक्ति रज से कषाय मैल से मलिन अन्तःकरण रूप दर्पण को मांजने से वह श्रात्म दर्पण स्वच्छ हो जाता है और तब उस नाम दर्पण में समस्त चराचर जगत् की वस्तुयें प्रतिबिम्बित होने लगती हैं । इस अरहन्त नमस्कार रूप 'रामो श्रहन्तार' पद का महत्व इस गाथा में कहा है । (देखो मूलाचार ) : अरहंत मोवकारं भावेण थे जो करेदि पदमयो । सो सव्व दुक्ख मोक्खं पावदि ग्रचिरेण काले ।।१६३० ।। www.
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy