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अध्याय आठवां ]
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आधार पर कहा जाता है। यह भी विचार तर्क संगत नहीं है । जीवट्ठा की चर्चा पर आदर्श प्रति के आधार से विचार किया जाये, तो विदित होगा कि वीर सेनाचार्यको भूतबलि दुखतंताचार्य रहित नहीं माना है । अलंकार चिन्तामणि में अन्य ग्रन्थकार रचित मंगल को अनिबद्ध मंगल कहा है । 'परकृतमनिबद्धं । जीवद्वाण ग्रन्थ का विशेषण बाह्य है, "इदं पुरा जीवद्वारा बिमंगल" ( पू. ४१) भ्रम से लोग 'निबद्ध मंगलं यस्मिन् तत्' इस प्रकार अर्थ विस्मरण कर पारिभाषिक निबद्ध मंगल मान बैठते हैं । जीवलाण ग्रन्थ के आदि में मंगल है | ग्रन्थ को ही निबद्ध मंगल कहना प्रसंगत बात होगी । अतः यह अर्थ उचित होगा कि इस जीवद्दारण ग्रन्थ में मंगल निबद्ध किया है । जब गौतम गणधर ने reter मंत्र को अपने द्वारा निबद्ध ग्रागम ग्रन्थों में लिखा है, तब जीवट्ठाण में afra विवेचन का विरोधी अर्थ करना विज्ञ व्यक्तियों का कर्तव्य है ।.
प्रश्न :- अपराजित मूल मंत्र में 'खमो अरहन्तार' को प्रथम स्थान क्यों दिया गया है ?
उत्तर - पूज्यता की दृष्टि से प्रष्ट कर्मों का क्षय करने वाले सिद्ध भगवान को प्रणाम रूप ' णमो सिद्धाणं' पद पहले रखा जाना चाहिये था, किन्तु अपराजित मूल मंत्र में 'रामो अरहन्ता' को प्रथम स्थान पर रखा है। रहस्य है ।
इसका विशेष
सम्यग्ज्ञान के द्वारा इष्ट पदार्थों की उपलब्धि होती है । उस ज्ञान का साधन शास्त्र हैं । उन राज्यों के मूल कर्ता मरहन्त भगवान हैं । इस कारण जीव मोक्ष प्राप्त करने वाली जिनवाणी के जनक होने से जिनेन्द्र तीर्थंकर सर्व प्रथम वन्दनीय माने गये हैं, क्योंकि उपकार को न भूलना सत्पुरुषों का मुख्य कर्तव्य है । उपकार करने वाले प्रभु का स्मरण न करने से कृतघ्नता का दोष लगता है । नीच माने जाने वाले पशु तक अपने उपकारी के उपकार को स्मरण रखते हैं, तब विचारवान मनुष्य को तो कृतज्ञता की मूर्ति बनना चाहिये । उपकृत व्यक्ति की दृष्टि में उपकर्ता का सदा अन्य की अपेक्षा उच्च स्थान माना गया है ।
हरिवंश पुराण में एक कथा आई है. चारूदत्त ने मरते हुए बकरे के कान में पंच नमस्कार मंत्र दिया था । उस मंत्र से बकरा सौधर्म स्वर्ग में देव हुआ । वह देव कुकंटक नामक द्वीप के कर्कोटक पर्वत पर जिन चैत्यालय में विद्यमान मुनिराज के चरणों के समीप स्थित चारुदत्त के पास पहुँचा । उस देव ने पहले चारुदत्त को