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________________ ६६२ ] गो. प्र. चिन्तामणि परिहन्त पद शब्द नहीं है । प्रतएव दोनों पाठ भिन्न-भिन्न दृष्टियों से सम्यक हैं । सूक्ष्म विचार से ज्ञात होगा कि बारहवें गुणस्थान के अंत में भगवान अरि समूह का नाश करने से अरिहन्त हो गये । इसके अन्तर सुरेन्द्रादि देवगरण अाकर जब केवलज्ञान कल्याणक की पूजा करते हैं, तब 'अरिहन्ति पूर्य सक्कार' इस दृष्टि से उनको अर्हन्त कहेंगे । उनका 'अरहन्त' रूप प्राकृत भाषा में पाया जाता है । णमो अरिहन्ताणं रूप पंच नमस्कार मंत्र का भूत बलि-पुष्पदंताचार्य के पहले सद्भाव था। इसके प्रमाण उपलब्ध होते हैं । मलाराधना नाम की भगवती पाराधना पर रचित टीका में पृष्ठ २ पर यह महत्त्वपूर्ण उल्लेख आया है, कि सामायिक आदि अमबाह्य भागम में तथा लोक बिन्दुसार है, अन्त में जिसके ऐसे चौदह पूर्व साहित्य के प्रारम्भ में गौतम गणधर ने णमो अरहन्तारणं इत्यादि रूप से पंच नमस्कार पाठ लिखा है । जब गणधर देव रचित अंग तथा अंग बाह्य साहित्य में एमो गरहन्ताणं इत्यादि मंगल रूप से कहे गये हैं। तो फिर इनकी प्रचलित मान्यता निर्दोष रहती है, जिसमें यह पढ़ा जाता है 'अनादिमूलमंत्रोऽयम्' । मूलाराधना टीका के ये शब्द ध्यान देने योग्य हैं, 'यद्येवं सकलश्रुतस्य सामयिकादेर्लोक बिन्दुसारान्तस्यादौ मंगलं कुर्वद्भिर्गणधरैः समो प्ररहन्तारणमित्यादिना कथं पंचानों (परमेष्टिनां) नमस्कारः कृतः ? वृहत्प्रतिक्रमरण पाठ में दोष शुद्धि के लिये गौतम मरणधर ने यह लिखा है, 'मूलगुणसु उत्तरगुणेसु अइक्कमो जाव अरहन्ताण भयवंताएं पज्जुवासं करेमि तात्रकायं (बोसिरामि) पृष्ठ १५१)।' टीकाकार पज्जुवास अर्थात् पुर्यपासना का स्वरूप इस प्रकार कहते हैं कि २२४ उचासों द्वारा १०८ बार पंच नमस्कार मंत्र का उच्चारण करे । टीकाकार प्रभाचन्द्र आचार्य के शब्द इस प्रकार है 'पज्जुवासं करेमि - एकाग्रेशण हि विशुद्ध न मनसा चतुर्शित्युत्तर शतात्रयाधु च्छ्वासैरष्टोत्तर शतादिवारान् पंचनमस्कारोच्चारणमहतां पर्यकासनकरण तद्यावत् कालं करोमि ........।' पंच समस्कार मंत्र का तीन उच्छवासों में पाठ करने का 'मुनियों के प्राचार ग्रन्थों में प्रतिक्रमण प्रायश्चित्तादि के लिये उल्लेख पाया जाता है । मुनि जीवन के लिये जैसे २८ मूलगुरण प्रारण स्वरूप हैं. इसी प्रकार यह मूलमंत्र भी अत्यन्त आवश्यक है । पैतीस अक्षरात्मक यह मूल मंत्र जैन उपासक तथा पाश्रम जीवन के लिये प्रावश्यक है । भूतबलि-पुष्पदन्त के पश्चात् इसकी रचना भानना जीवद्वारण के निबद्ध अनिबद्ध भेद युक्त मंगल चर्चा के
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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