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________________ अध्याय : आठवां ] जो नमस्कार करने योग्य हैं. पूजा के अह अर्थात योग्य हैं, लोक में देवों में उत्तम हैं । रज अर्थात् ज्ञानावरण, दर्शनावरण के नाश करने वाले हैं, अथवा अरि अर्थात् मोहनीय और अंतराय के नाश करने वाले हैं, इससे अरिहन्त कहते हैं । टीकाकार प्राचार्य वसुनन्दि सिद्धान्त चक्रवर्ती लिखते हैं 'येनेह कारणनेत्थंभूतास्तेनाहत्तः सर्वज्ञाः सर्वलोकनाथा लोकेऽस्मिन्नुच्यन्ते। वे इन कारणों से. इस प्रकार हैं, अतएव उनको अर्हन्त, सर्वज्ञ, सर्वलोक के नाथ इस लोक में कहते हैं। केवली भगवान को अन्तरंग कर्म के क्षय करने की दृष्टि से अरहिन्त कहते हैं । मूलाचार में कहा है--- अरिहन्ति बंदण -- रामसारिण अरिहन्ति पूय-सरकारं । श्ररहन्ति सिद्धिगमणे अरहन्ता तेरण उच्चंति ॥१६२५॥ वन्दना तथा नमस्कार के योग्य हैं, पूजा-सत्कार के योग्य हैं, सिद्धि ममन के योग्य हैं, इससे इन जिनेन्द्र को अरहन्त (अर्हत) कहते हैं। कभी-कभी यह शंका उत्पन्न होती है कि 'रामो अरिता पाठ ठीक है या 'मो अरहताएं पाठ ठीक है ? उपरोक्त विवेचन के प्रकाश में यह विदित होता है कि दोनों पाठ सम्यक् हैं । बृहत् प्रतिकभरा पाठ के सूत्र में गौतम गणधर बताते हैं 'सुत्तस्य मूलपदाण मच्चासणदाएं' अर्थात् आगम के मूल पदों में होनता कृत जो दोष उत्पन्न हुआ है, उसका मैं प्रतिक्रमण करना चाहता हूँ। प्रभाबन्द्राचार्य की टीका में ये शब्द प्राये हैं-- सूयस्य आगमस्य सम्बन्धिनां मूलपदानां प्रधान पदानामत्या सादनता हीनता तस्यां यः कश्चिदुत्पन्नोदोषस्तं प्रतिक्रमितु मिच्छामि । इसका उदाहरण देते हये कहते हैं---'तं जहा गमोक्कारपदे णमो अरहतारणमित्यादिलक्षणे पंचनमस्कार पदे याज्यासादनता तस्यां अरहत पदे इत्यादि 'अहदादीनांवाचके पदे यायासादनता तस्यां मंगलपदे चत्तारिमंगलमित्यादि लक्षणे, लोगुत्तमपदे चत्तारि लोगुत्तमा, इत्यादि स्वरूपे सरणपदे चत्तारिसरणं पन्धज्जामि इत्यादि लक्षणे...........' (पृष्ठ १३६) इसमें उल्लेखनीय बात यह है कि मौतम स्वामी रामोकार पद के द्वारा मो अरहता इत्यादि पंच नमस्कार पद का संकेत करते हैं । इससे यह 'भो अरहताण' नादि पद रूप नमस्कार मंत्र षट् खंडागम सूत्रकार भूतबलि-पुष्पदंत कृत है। यह प्राधुनिक प्रचार भ्रांत प्रमाणित होता है। इसके पश्चात् 'अरहन्त पदे' शब्द का प्रयोग पाया है,
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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