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[ गो. प्र. चिन्तामणि 'रजोहननाद्वा अरिहन्ता ज्ञान दगावरणानि रजांसीव बहिरंगान्तरंगा शेष - त्रिकाल गोचरानन्तार्थ-व्यंजन परिणामात्मक-वस्तुविषय-बोधानुभव प्रतिबंधकत्वात् रजांसि' अथवा रज का नाश करने से अरिहंत हैं, ज्ञानावरण तथा दर्शनावरण रज के समान हैं । बाह्य तथा अन्तरंग समस्त त्रिकाल गोचर अनंत अर्थ पर्याय और व्यंजन पर्याय स्वरूप वस्तुओं को विषय करने वाले बोध तथा अनुभव के प्रतिबंधक होने से वे ज्ञानावरण, दर्शनावरण कर्म रज हैं। मोहनीय कर्म भी रज है, क्योंकि जिस प्रकार जिनका मुख भस्म से व्याप्त होता है, उनमें जिम्ह भाव अर्थात् कार्य की मंदता देखी जाती है । उसी प्रकार मोह से जिनका आत्मा व्याप्त हो रहा है, उनके भी जिम्ह भाव देखा जा सकता है । अर्थात् उनकी स्वानुभूति में कालुष्य मन्दता या कुटिलता पाई जाती है । इन तीन कर्मों के क्षय के साथ अन्य कर्मों का नाश अवश्यंभावी है । अतएव उक्त रजों के नाश करने से जिनेन्द्र अरिहन्त हैं।
रहस्याभावाद्वा अरहिन्ता रहस्यमंतरायः तस्य शेषधातित्रितय-विनाशाविना. भाविनो भ्रष्टबीजवन्तिः शक्ति कृता पाति कर्मणो हननादरिहन्ता । रहस्य का प्रभाव करने से अरिहन्त हैं। अंतराय कर्म रहस्य है । उस अन्तराय कर्म के क्षय का ज्ञानावरण, दर्शनावरण तथा मोहनीय कर्म के क्षय के साथ अधिनाभाव है, अन्तराय के नाश होने पर अधातिया कर्म भ्रष्ट बीज के समान शक्ति रहित हो जाते हैं । अतएव अन्तराय के क्षय से जिनेन्द्र को अरिहन्त कहते हैं ।
जिन भगवान को अहंत भी कहते हैं । 'अतिशयपूजाहत्वाद्वाहतः । स्वर्गावतरण-जन्माभिषेक-परिनिष्क्रमण केवल ज्ञानोत्पत्ति-परिनिर्वाणेषु देवकृतानां पूजानां देवासुरमानव प्राप्त पूजाभ्योऽधिकत्वादतिशयाना महत्वा द्योग्यत्वादहन्त : अतिशय युक्त पूजा को प्राप्त होने से अर्हन्त हैं । स्वर्गावतरण, जन्माभिषेक, परिनिष्क्रमरण अर्थात् दीक्षा, केवलज्ञान की उत्पत्ति तथा परिनिर्धारण रूप पांच कल्याणकों में देवकृत पूजाएँ सुर, असुर, मानवी की पूजाओं से अधिक होने से अतिशयों के अर्ह अर्थात् योग्य होने से अर्हन्त हैं। मूलाचार में कहा है--
प्ररहन्ति वमोक्कारं परिहापूजा सुरतमा लोए । रअहंता अरिहतिय अरहन्ता तेगा उच्चंछे ।।१६२४॥