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________________ अध्याय : पाठवां । [ ६८६ केवली के उपांत्य समय में क्षय होता है और १३ प्रकृतियों का क्षय अयोगी के अंतिम समय में होता है । इस दृष्टि से खुलासा हो जाता है कि सयोगी जिन के किसी भी कर्म का क्षय नहीं होता है । अरिहन्त या अहल् शब्द गुरणवाचक है-- अन्य संप्रदायों में केवली शब्द के स्थान में जिनेन्द्र देव की अर्हत् या अरिहन्त के रूप में प्रसिद्ध है। ऋग्वेद में अर्हन्त का उल्लेख पाया है अर्हन्इदं दयसे विश्वमम्वम्। मुद्राराक्षस नाटक में जो अर्हन्त के शासन को स्वीकार करेंगे, वे मोह व्याधि के वैद्य हैं, ऐसा उल्लेख पाया है 'मोहवाहिवेज्जाणं अलिहन्ताणसासरणं पडिबज्जह ।' हनुमन्त नाटक में लिखा है 'महन्त इत्यथ जैन शासनरताः' जैन शासन के भक्त अपने आराध्य देव को अर्हत् कहते हैं। यह अरहंत शब्द गुण वाचक है। जो भी व्यक्ति घातिया कर्मों का विनाश करता है, वह अरहन्त वन जाता हैं । अतः यह शब्द व्यक्ति वाचक न होकर गुरण ___ 'अ' का अर्थ विष्णु 'अकारो विष्णुनामस्यात् । केवली भगवान केवलज्ञान के द्वारा सर्वत्र व्याप्त है, अतः 'अ' का अर्थ होगा केवली भगवान, 'र' का अर्थ है राग कोश में कहा है 'रागेबलेखे' इत्यादि, 'ह' हनन करने वाले वाचक है। हर्षे च हननेहः, स्यात् । 'त' शूर वीर वाचक है । कहा भी है 'शूरे चौरे च तः प्रोक्तः । धवला ग्रन्थ में 'अरहताणं' पर प्रकाश डालते हुये लिखा है--अरिहननात् अरिहंता । नरक-तिर्वक्कुमानुष्य-प्रेताःयासगताशेष दुःख प्राप्ति निमित्तत्वात् अरिमोहः । तस्यारेहननादरिहन्ता । अर्थात् अरि के नाश करने से अरिहंत है नरक, तिर्यञ्च, कुमानुष, प्रेत इन पर्यायों में निवास करने से होने वाले समस्त दुःखों की प्राप्ति का निमित्त कारण होने से मोह को अरि अर्थात् शत्रु कहा है । उस मोह शत्रु का नाश करने से अरिहत हैं। . अन्य कर्म महनीय कर्म के प्राधीन हैं, क्योंकि मोहनीय कर्म के बिना शेष कर्म अपना कार्य करने में समर्थ नहीं होते हैं। बारहवें क्षोण मोह गुणस्थान की प्राप्ति होने पर अन्त समय में पंच ज्ञानावरण, पंच अंतराय, तथा दर्शनावरण चतुष्टय शीघ्र नष्ट हो जाते हैं और झीरण मोहि आत्मा केबली, स्नातक, परमात्मा, जिनेन्द्र बन्न जाता है।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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