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________________ २४० ] [ गो. प्र. चिन्तामणि . गीत वादिन निर्घोषैर्जय मंगल पाठकः । विबोध्यन्ते शुभैः शब्दः सुखनिद्रात्यये यथा ।।३६१३॥. तथा वे देव उस उपपाद शय्या में ऐसे उत्पन्न होते हैं कि जैसे कोई राजकुमार .. सोता हो और वह गीत वादिनों के शब्दों से, 'जय जय' इत्यापि मंगल के पाठों से तथा । उत्तमोत्तम शब्दों से. सुखनिद्रा का अभाव होने पर जगाया जाता है; उसी प्रकार देव भी उस उपपाद शिला (शय्या) से उठकर सावधान होते हैं । किञ्चिभ्रममपाकृत्य वीक्षते स शनैः शनैः । । यावदाशा मुहुः स्निग्धस्तदा करणन्तिलोचनैः ।।३६२। · तथा उस उपपाद शध्या में सामान होकार कुछ प्रम को दूर करके उस समय कर्गान्त पर्यन्त नेत्रों को उघाड़ कर दृष्टि फर फेर चारों ओर देखता है। . इन्द्रजालमथ स्वप्नः किं नु मायाभ्रमोनु किम् । दृश्यमान मिदं चित्रं मम नायाति निश्चयम् ।।३६३।। फिर सावधान होकर वह देव ऐसा विचारता है कि अहो ! यह क्या इन्द्रजाल है ? अथवा मुझे क्या स्वप्न पा रहा है ? अथवा यह मायामय कोई भ्रम है, यह तो बडा ग्राश्चर्य देखने में आता है, निश्चय नहीं कि यह क्या है ? इस प्रकार सन्देह रूप होता है। इदं रम्यमिदं सेव्य मिदं श्लाध्यमिदं हितम् । इदं प्रियमिदं भव्यमिदं चित्त प्रसत्तिदम् ।।३६४।। एतत्कन्द लितानन्द मेतकल्याण मन्दिरम् । एतनित्योत्सवाकीख मेतदत्यन्त सुन्दरम् ।।३६५॥ सद्धिमहिमोपेतं महद्धिक सुराचितम् । सप्तानी कान्वितं भाति त्रिदशेन्द्र समाजिरम् ।।३६६॥ तत्पश्चात् वह देव विचार करता है कि यह बस्तु र मणीय है, यह सेवनीयः । है, यह सराहने योग्य है, यह हितरूप है, यह प्रिय है, यह सुन्दर है, यह चित्त को ... प्रसन्नता देने वाली है तथा यह अानन्द को उत्पन्न करने वाला कल्यागा का मंदिर निरन्तर उत्सव रूप तथा अत्यन्त सुन्दर है. इत्यादि विचार करता है तथा यह स्थान समस्त ऋद्धि और महिमा सहित महाऋद्धि के धारक देवों से पूजनीय सात प्रकार की सेना सहित देवेन्द्र के स्थान के समान दीखता है। । LU
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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