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________________ अध्याय दुसरा ] मामेवोद्दिश्य सानन्दः प्रवृतः किमयं जनः पुण्यमूत्तिः प्रियः श्लाध्यी विनीतोऽत्यन्त वत्सलः ॥ ३६७॥ त्रैलोक्यनाथ संसेव्यः कोऽयं देशः सुखाकरः । अनन्त महिमा धारो विश्व लोकाभिनन्दितः ॥ ३६८ ॥ इदं पुरमति स्फीतं वनोप वनराजितम् । अभिभूय जगत्या वलातोव ध्वजांशुकः ॥ ३६६॥ [ २४१ फिर वह देव विचारता है कि ये सामने जो लोग खड़े हैं, वे मुझे ही देखकर अनन्य सहित प्रवृत्त हैं, ये पवित्र हैं, उज्जवल है, मूर्ति जिनकी ऐसे हैं तथा ये सब बहुत प्रिय हैं, प्रशंसनीय हैं, विनीत हैं. चतुर हैं, अत्यन्त प्रीति युक्त हैं तथा फिर विचारता है कि यह सुख को खानि लोन लोक के स्वामी द्वारा सेवने योग्य कौनसा देश ? यह देश अनन्त महिमा का आधार है, सबको बांछनीय है तथा यह नगर भी प्रति विस्तीस है, वह उपनों से शोभित है, संपदा के द्वारा समस्त जगत को जीतकर ध्वजाओं के वस्त्रों के हिलने से मानो दौड़ता है, नृत्य ही करता है, इत्यादि विचारता है । प्राकलय्य तदाकूतं सचिव दिव्यं चक्षुषः । नति पूर्व प्रवर्तन्ते वक्तु कालोचितं तदा ॥३७०॥ प्रसादः क्रियतां देव मतानां स्वेच्छ्या दृशां 1. श्रयतां च वचोऽस्माकं पौर्वापर्य प्रकाशकम् ॥३७१॥ तत्पचात् उमो समय यहां के मंत्री देव दिव्यनेत्रों से उस उत्पन्न हुए देवेन्द्र के अभिप्राय को समझकर नमस्कार करके कहते हैं कि हे देव । हम सेवकों पर प्रसन्न होये, निर्मल दृष्टि से देखिये और हमारे पूर्वी पर परिपाटी के प्रकाश करने वाले वचनों को सुनिये | अनाथ वयं धन्याः सफलं चाद्य जीवितम् । अस्माकं यत्त्वया स्वर्गः संभवेन पवित्रितः ॥ ३७२ ॥ प्रसीद जय जीव त्वं देव पुण्यस्तवोद्भवः । भव प्रभुः समग्रस्य स्वर्गलोकस्य सम्प्रति ॥ ३७३ ॥ सौधर्मोऽयं महाकल्पः सर्वामर शताचितः ॥ नित्याभिनवकल्याणवाद्धि वर्द्धन चन्द्रमाः ॥ ३७४ ॥ कल्पः सौधर्म नामायमीशान प्रमुखाः सुराः । satarन्नस्य शक्रस्य कुर्वन्ति परमोत्सवम् ॥ ३७५॥ # 1
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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