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अध्याय : पांचवां ।
[२३६ शिरीषसुकुमाराङ्गाः पुण्य लक्षण लक्षिताः। अणिमादि गुरंगोपेता ज्ञान विज्ञान पारगाः ॥३५६।। मृगाङ्ग मूत्ति संकाशाः शान्त दोषाः शुभाशयाः। अचिन्त्य महिमोपेता भयक्लेशान्ति वजिताः ॥३५७।। बर्द्धमान महोत्साहा बनकाया महाबलाः अचिन्त्य पुण्य योगेन गृहन्ति वपुजितम् ।।३५८।।
उस उपपाद शय्या का स्थान कैसा है कि समस्त इन्द्रियों को सुख देने वाला है, रमणीक है, नित्य ही उत्सव सहित विराजता है, गीत बादिनादि लीलाओं सहित है. तथा "जयवन्त होओ, चिरंजीवी होयो" ऐसे शब्दों से व्याप्त है ऐसे स्थान पर जो देव उत्पन्न होते है, ने जैसे हैं कि दिलय सुन्दराकार है . संस्थान जिनका सप्त धातु रहित शरीर है, जो शरीर की प्रथा रूपी जल के प्रभावों से समस्त दिशाओं को प्रसन्न करने वाले हैं जिनका शरीर शिरीष पुष्प के समान कोमल है, पवित्र लक्षणों सहित हैं, अरिंगमा महिमादि गुणों से युक्त है, अवधिज्ञानादि विज्ञान चतुरतानों के पारगामी हैं तथा चन्द्रमा की मूर्ति समान हैं; जिनसे सब दोष शान्त हो गये हैं, जिनका चित्त शुभ है, अचिन्त्य महिमा सहित हैं, भय क्लेश पीड़ा से रहित हैं जिनका उत्साह बढ़ता ही रहता है, वज्र के समान दृढ़ पारीर हैं, पराक्रमी हैं, इस प्रकार के देव अचिन्त्य पुण्य से उस उपपाद स्थान में शरीर को धारण करते है।
सुखामृतमहाम्सोधेमध्यादिव घिनिर्गताः। ... . भवन्ति त्रिदशाः सद्यः क्षणेन नवयौवनाः ॥३५.६।।
उस उपपाद शय्या में वे देव उत्पन्न होते हैं, सो जिस प्रकार समुद्र में से कोई मनुष्य निकले उसी प्रकार वे देव सुख रूपी महा समुद्रों में से तत्काल नव यौवन रूप होकर उत्पन्न होते हैं।
कि च पुष्पकलाक्रान्तः प्रवालदल दन्तुरः । तेषां कोकिला वाचालंदु में जन्म निगद्यते ॥३६०॥ .
फूल फलों से भरपूर, कोमल पत्तों से अंकुरित और कोकिलाओं से शब्दाय . मान वृक्षों करके उनके जन्म की सूचना की जाती है।
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